भारत की अर्थव्यवस्था इस समय कई मोर्चों पर एक साथ दबाव झेल रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल संकट की आहट ने देश की आर्थिक चिंता को और गहरा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव हो रहा है और इसका सीधा असर भारत जैसे आयात आधारित देश पर पड़ रहा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में जैसे-जैसे वैश्विक तनाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे देश में पेट्रोल-डीजल महंगा होने, महंगाई बढ़ने और आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ने का खतरा भी तेज हो गया है। पिछले डेढ़ साल के आर्थिक हालात पर नजर डालें तो तस्वीर काफी चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई ने भारतीय बाजार से भारी निकासी की है।
अनुमान के मुताबिक करीब 20 अरब डॉलर की पूंजी भारतीय बाजार से बाहर चली गई। इसका असर शेयर बाजार से लेकर रुपये की स्थिति तक साफ दिखाई दे रहा है। हैरानी की बात यह है कि अमेरिकी डॉलर वैश्विक स्तर पर कमजोर पड़ने के बावजूद भारतीय रुपया मजबूत नहीं हो पा रहा। रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है, जो देश की आर्थिक सेहत को लेकर चिंता बढ़ाता है। इसके साथ ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई का स्तर भी बेहद कमजोर बना हुआ है। कई बड़ी भारतीय कंपनियां अब विदेशों में निवेश बढ़ा रही हैं, जिससे देश के भीतर निवेश की गति धीमी पड़ती दिखाई दे रही है। इसका असर रोजगार और उद्योगों पर भी पड़ रहा है। नई नौकरियों की रफ्तार उतनी तेज नहीं है जितनी देश की युवा आबादी को चाहिए। बेरोजगारी और महंगाई का यह दोहरा दबाव आम लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना रहा है। सबसे बड़ी चिंता महंगाई को लेकर है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा।
परिवहन महंगा होगा, माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी और फिर खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सब महंगे हो जाएंगे। यानी आने वाले महीनों में आम आदमी को हर मोर्चे पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है। पहले ही खाद्य पदार्थों, गैस सिलेंडर और बिजली की लागत बढ़ने से लोगों की जेब पर असर दिख रहा है। देश के आर्थिक जानकारों का मानना है कि इस समय सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रित रखने की है। क्योंकि अगर महंगाई और बेरोजगारी दोनों एक साथ बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर खपत और बाजार पर पड़ता है। भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक घरेलू मांग पर आधारित है। अगर लोगों की खरीदने की क्षमता कमजोर होती है तो उद्योगों की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
हालांकि इन चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के सामने सबसे अहम सवाल यही है कि इस संकट से कैसे निपटा जाए। बीते वर्षों में कई ऐसे मौके आए जब देश ने बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट देखे। कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया आर्थिक मंदी से जूझ रही थी, लेकिन भारत ने अपेक्षाकृत तेजी से वापसी की। उस समय सरकार ने मुफ्त राशन योजना, गरीब कल्याण पैकेज, वैक्सीन अभियान और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के जरिए अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश की थी। यही कारण है कि आज भी कई विशेषज्ञ मानते हैं कि संकट के समय सरकार बड़े फैसले लेने से पीछे नहीं हटती।
चार से छह महीने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण
आने वाले चार से छह महीने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। एक तरफ पश्चिम एशिया का संकट गहराता है तो दूसरी तरफ कमजोर मानसून का खतरा भी चिंता बढ़ा रहा है। अगर मानसून सामान्य से कमजोर रहता है तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर सीधे खाद्य महंगाई पर पड़ेगा। भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, वहां कमजोर बारिश सिर्फ किसानों ही नहीं बल्कि पूरे बाजार को प्रभावित करती है। मोदी सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती दिखाई दे रही है। पहली चुनौती तेल और वैश्विक संकट से पैदा होने वाले आर्थिक दबाव को संभालने की है और दूसरी चुनौती घरेलू स्तर पर रोजगार और महंगाई को नियंत्रित रखने की।
सरकार आने वाले समय में कुछ बड़े आर्थिक कदम उठा सकती है। पेट्रोल-डीजल पर टैक्स में राहत, गरीब वर्ग के लिए अतिरिक्त सहायता, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में तेजी और घरेलू निवेश को बढ़ावा देने जैसे फैसले सामने आ सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक भी महंगाई और रुपये की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। अगर रुपया ज्यादा कमजोर होता है तो आयात महंगा होगा और इसका असर सीधे महंगाई पर पड़ेगा। इसलिए सरकार और रिजर्व बैंक दोनों के लिए संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती है। राजनीतिक तौर पर भी यह समय काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्योंकि महंगाई हमेशा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनती है। पेट्रोल-डीजल के दाम, खाने-पीने की चीजों की कीमतें और रोजगार की स्थिति सीधे जनता के मूड को प्रभावित करती है। ऐसे में केंद्र सरकार की कोशिश होगी कि आम लोगों पर बोझ कम से कम पड़े और आर्थिक गतिविधियां तेज बनी रहें। फिलहाल देश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां वैश्विक युद्ध, तेल संकट, कमजोर निवेश और महंगाई जैसी चुनौतियां एक साथ दिखाई दे रही हैं। लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि भारत ने हर बड़े संकट के बाद खुद को संभाला है। अब नजर इस बात पर है कि मोदी सरकार आने वाले महीनों में कौन से आर्थिक फैसले लेती है और किस तरह देश को इस दबाव से बाहर निकालने की कोशिश करती है।

