पश्चिम एशिया संकट से उपजी चुनौती का मुकाबला करने का समय

पश्चिम एशिया संकट जारी है। अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की कोशिशें भी जारी हैं लेकिन परिणाम क्या होगा पता नहीं। इस अनिश्चितता के बीच विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम 100 डालर प्रति बैरल से उपर चल रहे हैं। जिसका दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं पर प्रभाव दिखने लगा है। भारत चूंकि दुनिया की बड़ी आबादी वाला देश है, तेल एवं गैस संबंधी अपनी उर्जा जरूरतों के लिये आयात पर निर्भरता ज्यादा है इसलिये यहां स्थिति की प्रतिक्रिया अधिक गंभीरता से देखी जाती है। देश में पेट्रोल, डीजल के दाम 15 मई के बाद अब तक तीन चरणों में पांच रूपये लीटर तक बढ़ चुके हैं। दिल्ली में पेट्रोल का दाम 100 रूपये लीटर के करीब पहुंच चुका है जबकि सामान्य डीजल का दाम करीब 93 रूपये लीटर हो चुका है। वहीं, ताजा वृद्धि के बाद सीएनजी का दाम भी 90 रूपये प्रति किलो तक पहुंच चुके है।
देश में पेट्रोल, डीजल, सीएनजी के दाम बढ़ने के साथ महंगाई का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दिनों में ही दूध के दाम 2 से तीन रूपये लीटर बढ़ा दिये गये हैं। टैक्सी चालक, ट्रांसपोर्टर सभी भाड़ा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा रासायनिक खाद के दाम विश्व बाजार में बढ़ते जा़ रहे हैं। प्राकृतिक गैस और एलएनजी महंगी होने से नाइट्रोजन आधारित उर्वरक महंगा हो रहा है। यूरिया के दाम सबसे ज्यादा बढ़े हैं। हालांकि, भारतीय किसानों को उर्वरक की वैश्विक वृद्धि से अब तक बचाया गया है। सरकार ने देश में उर्वरक के दाम नहीं बढ़ाये परिणाम स्वरूप उर्वरक सब्सिडी बोझ बढ रहा है। चालू वित्त वर्ष के दौरान उर्वरक सब्सिडी बिल 70 हजार करोड़ रूपये बढ़कर 2.41 लाख करोड़ रूपये तक पहुंचने का अनुमान है। जबकि बजट में इसके लिये 1.71 लाख करोड़ रूपये का ही प्रावधान रखा गया है। ऐसे में बढ़ते सब्सिडी बोझ का कहीं न कहीं देश की अर्थव्यवस्था पर असर होगा।
डालर के मुकाबले रूपया लगातार कमजोर पड़ने से देश में आयात महंगा होगा। एक तरफ पेट्रोलियम पदार्थों के उंचे दाम और दूसरी तरफ कमजोर रूपया दोनों मिलकर महंगाई बढ़ायेंगे। अप्रैल की थोक महंगाई के आंकड़े चैकाने वाले हैं। मार्च 2026 में यह 3.88 प्रतिशत थी जो कि अप्रैल में उछलकर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई। थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति का यह 42 माह का उंचा आंकड़ा है। इसमें ईंधन और प्रकाश समूह का सूचकांक करीब 25 प्रतिशत बढ़ा है। वहीं, खुदरा मूल्य सूचकांक की बात करें तो अप्रैल 2026 में यह मामूली बढ़कर 3.48 प्रतिशत पर रहा। मार्च में यह 3.40 प्रतिशत रिकार्ड किया गया था। यह वृद्धि मुख्य तौर पर खाद्वान्न समूह की वृद्धि पर आधारित रही। खुदरा महंगाई फिलहाल रिजर्व बैंक के चार प्रतिशत के संतोषजनक दायरे में है। मई माह के आंकड़े क्या तस्वीर दिखाते हैं यह अगले महीने पता चलेगा।
कुल मिलाकर देश के समक्ष आज जो स्थिति है वह पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न अनिश्चितता, कच्चे तेल के उंचे दाम, विदेशी संस्थागत निवेशकों की शेयर बाजार से जारी निकासी और डालर के मुकाबले कमजोर पड़ते रूपये की वजह से है। रिजर्व बैंक ने भी अपनी ताजा मासिक रिपोर्ट में इसका जिक्र किया है। इसमें कहा गया है कि भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में अनिश्चितता के चलते चालू वित्त वर्ष में मुख्ययतः इक्विटी से अब तक 10 अरब डालर की निकासी हो चुकी है। वहीं दूसरी तरफ रिजर्व बैंक को रूपये को समर्थन देने के लिये वित्त वर्ष 2025-26 में 43 अरब डालर खर्च करने पड़े हैं। उसकी चिंता यह भी है कि पश्चिम एशिया में अनिश्चितता जारी रहने से वहां रहने वाले भारतीयों द्वारा देश में भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा प्रवाह पर भी असर पड़ सकता है। बहरहाल, यह संतोष की बात है कि पिछले वित्त वर्ष में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह एक साल पहले के मुकाबले 17 प्रतिशत बढ़कर 94.5 अरब डालर रहा। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बावजूद विदेशी निवेशकों की भारत में रूचि बरकरार है। विशेषतौर से वित्तीय और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नये निवेश की घोषणा को देखते हुये विदेशी निवेश प्रवाह बेहतर रहने की उम्मीद जताई गई है। वहीं भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों से लिये जाने वाले कर्ज में 2025-26 में एक साल पहले के मुकाबले नरमी आई है। वैश्विक बाजार में बढ़ती ब्याज दरों से कंपनियां सतर्कता बरत रही हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद विदेश व्यापार के मोर्चे पर आयात के मुकाबले निर्यात ज्यादा रहे यह प्रयास सफल नहीं हो पाया। निर्यात बढ़ता है तो आयात उससे ज्यादा हो जाता है। पेट्रोलियम पदार्थों और सोने की वजह से आयात बिल बढ़ता जाता है। सेवा निर्यात भी इतना नहीं बढ़ पाया कि वस्तु व्यापार के घाटे की भरपाई कर पाये।
यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की है। उन्होंने देशवासियों से पेट्रोल, डीजल और गैस का संयम के साथ इस्तेमाल करने, एक वर्ष तक विदेश यात्रा नहीं करने और सोना नहीं खरीदने की अपील की है। उन्होंने देशवासियों से हर उस वस्तु अथवा उत्पाद की खपत कम करने को कहा है जिस पर विदेशी मुद्रा खर्च होती है। हम सभी जानते हैं कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों का बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है। हम अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करते हैं जबकि 50 प्रतिशत से अधिक प्राकृतिक गैस आयात करते हैं। बीते वित्त वर्ष में देश में 70- 72 अरब डालर का सोना आयात किया गया। सोने की आयात मात्रा बेशक कम रही लेकिन दाम बढ़ने से खर्च बढ़ रहा है। खाद्य तेल की खपत कम करने पर भी जोर दिया गया है। बड़ी मात्रा में विदेशों से खाद्य तेल का आयात किया जाता है। वर्ष 2023-24 में 160 लाख टन खाद्य तेलों का आयात किया गया। इस पर 15 अरब डालर विदेशी मुद्रा खर्च हुई। वहीं, रासायनिक खाद्य की बात करें तो यूरिया, डीएपी, एमओपी, एनपीके जैसे उर्वरकों का आयात बिल 18 अरब डालर तक पहुंचने का अनुमान है।
प्रधानमंत्री की हाल की पांच देशों (यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नार्वे और इटली) की यात्रा मौजूदा परिवेश में काफी अहम् रही। इस यात्रा के दौरान देश में करीब 40 अरब डालर के नये निवेश और विस्तार योजना का वादा किया गया। सेमिकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन और संयुक्त उर्जा परियोजनाओं पर समझौते किये गये। देश में विदेशी निवेश प्रवाह बढ़ाने में इनका अहम योगदान होगा। यही समय की जरूरत है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shopping Cart