देश में महंगाई के मोर्चे पर लंबे समय से बनी राहत के बीच मई महीने में कीमतों का दबाव कुछ बढ़ता दिखाई दिया है। खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के चलते खुदरा महंगाई दर (रिटेल इंफ्लेशन) बढ़कर 3.93 प्रतिशत पर पहुंच गई है। हालांकि यह आंकड़ा अभी भी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से नीचे है, लेकिन अप्रैल की तुलना में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और घरेलू स्तर पर ईंधन की बढ़ी कीमतों का असर आने वाले महीनों में और स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है। महंगाई लगातार नियंत्रण में रहने से अब तक अर्थव्यवस्था को सहारा मिला है, लेकिन मई के आंकड़ों ने यह संकेत जरूर दिया है कि कीमतों पर दबाव फिर बढ़ने लगा है। ऐसे में सरकार और RBI दोनों की नजर अब आने वाले महीनों के आंकड़ों पर टिकी रहेगी। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.93 प्रतिशत हो गई। अप्रैल 2026 में यह 3.48 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस तरह एक महीने के भीतर महंगाई दर में 0.45 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी देखने को मिली।
मई का आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह जनवरी 2026 से लागू की गई संशोधित सीपीआई श्रृंखला के तहत अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। सरकार ने इस वर्ष की शुरुआत में महंगाई मापने की प्रणाली में बदलाव करते हुए नई उपभोक्ता टोकरी (कंजम्प्शन बास्केट) और नया आधार वर्ष लागू किया था। इस बदलाव का उद्देश्य लोगों के वर्तमान खर्च के पैटर्न को अधिक सटीक रूप से दर्शाना है ताकि महंगाई का वास्तविक आकलन किया जा सके। हालांकि महंगाई दर में वृद्धि हुई है, लेकिन राहत की बात यह है कि यह लगातार 16वें महीने RBI के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से नीचे बनी हुई है। इससे पहले भी कई महीनों तक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अपेक्षाकृत नरमी और आपूर्ति की बेहतर स्थिति के कारण महंगाई नियंत्रण में रही थी।
मई में महंगाई बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण खाद्य और ईंधन कीमतों में तेजी रही। सब्जियों, कुछ आवश्यक खाद्य वस्तुओं तथा परिवहन लागत में बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डाला। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भी घरेलू महंगाई पर दिखाई दिया। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। दुनिया के अधिकांश देशों की तरह भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव घरेलू ईंधन कीमतों और परिवहन लागत पर पड़ता है, जिसका असर अंततः रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई देता है।
मई महीने के दौरान सरकारी तेल कंपनियों ने ईंधन की कीमतों में चार बार वृद्धि की
मई महीने के दौरान सरकारी तेल कंपनियों ने ईंधन की कीमतों में चार बार वृद्धि की। पेट्रोल और डीजल की बढ़ी कीमतों ने माल ढुलाई की लागत को प्रभावित किया, जिससे विभिन्न वस्तुओं के परिवहन पर खर्च बढ़ा। यही कारण है कि कई उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिली। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पिछले वर्ष के कम आधार प्रभाव (लो बेस इफेक्ट) की वजह से भी खाद्य महंगाई में वृद्धि का असर अधिक दिखाई दे रहा है। बीते वर्ष कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतें अपेक्षाकृत कम थीं, जबकि इस बार उनकी कीमतों में क्रमिक वृद्धि दर्ज की जा रही है।
इससे कुल महंगाई दर पर दबाव बढ़ा है। भारतीय रिजर्व बैंक को 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक की पांच वर्षीय अवधि के लिए खुदरा महंगाई को 4 प्रतिशत पर बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई है। केंद्र सरकार और RBI के बीच तय इस मुद्रास्फीति लक्ष्य ढांचे के तहत महंगाई के लिए 2 प्रतिशत से 6 प्रतिशत का स्वीकार्य दायरा निर्धारित किया गया है। यानी यदि महंगाई दर इस सीमा के भीतर रहती है तो उसे लक्ष्य के अनुरूप माना जाता है। RBI के लिए यह स्थिति फिलहाल संतोषजनक मानी जा सकती है क्योंकि महंगाई अभी भी 4 प्रतिशत के लक्ष्य और 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा से काफी नीचे है। इससे केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों के संबंध में निर्णय लेने में अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन मिल सकता है। हालांकि यदि आने वाले महीनों में खाद्य और ईंधन कीमतों का दबाव बढ़ता है तो मौद्रिक नीति पर इसका असर पड़ सकता है। मानसून की स्थिति आगामी महीनों में महंगाई की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी। यदि बारिश सामान्य रहती है और कृषि उत्पादन बेहतर होता है तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
वहीं कमजोर मानसून या आपूर्ति संबंधी बाधाएं खाद्य महंगाई को और बढ़ा सकती हैं। आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए कम महंगाई हमेशा सकारात्मक मानी जाती है क्योंकि इससे उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़ती है और निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। पिछले 16 महीनों से महंगाई नियंत्रित रहने के कारण अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिली है, लेकिन मई के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि कीमतों पर दबाव धीरे-धीरे लौट सकता है। फिलहाल महंगाई RBI के निर्धारित लक्ष्य के भीतर बनी हुई है, लेकिन खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें, ईंधन लागत में वृद्धि और वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितताएं आने वाले समय में चुनौती बन सकती हैं। ऐसे में सरकार और केंद्रीय बैंक दोनों के लिए महंगाई पर लगातार नजर बनाए रखना आवश्यक होगा, ताकि आर्थिक विकास और मूल्य स्थिरता के बीच संतुलन कायम रखा जा सके।

