चीड़ हटाओ आंदोलन’ (Pine Removal Movement) उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने और स्थानीय आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए चलाया गया एक महत्वपूर्ण पर्यावरण अभियान है। इसके तहत वनों से विदेशी प्रजाति के चीड़ (Pine) के पेड़ों को हटाने और स्वदेशी प्रजाति के बांज (Oak) के पेड़ लगाने की मांग की जाती है। [1, 2]
यह आंदोलन क्यों चलाया गया?
पहाड़ों में चीड़ के पेड़ों की बहुतायत के कारण पर्यावरण और स्थानीय संस्कृति को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसका विरोध इस आंदोलन के जरिए किया जाता है:
- जल संकट और मिट्टी का कटाव: चीड़ के पेड़ों की पत्तियां (पिरुल) जल्दी नहीं सड़ती हैं, जिससे मिट्टी में नमी और पानी का अवशोषण रुक जाता है। ये पेड़ पानी भी बहुत ज्यादा सोखते हैं।
- अनुपजाऊ भूमि: चीड़ की सूखी पत्तियों में आग जल्दी पकड़ती है, जिससे गर्मियों में जंगलों में भीषण आग (दावानल) लगती है और पूरा इकोसिस्टम नष्ट हो जाता है।
- चारा और ईंधन का अभाव: चीड़ के जंगल में मवेशियों के लिए घास और स्थानीय लोगों के लिए उपयोगी ईंधन (लकड़ी) नहीं मिलता है।
बांज का महत्व
चीड़ के मुकाबले बांज (Oak) के पेड़ों को पर्यावरण और हिमालयी क्षेत्रों के लिए अमृत माना जाता है। इनकी जड़ें पानी को रोक कर रखती हैं, पत्तियां बेहतरीन जैविक खाद बनाती हैं और इनसे बारहमासी जलस्रोतों (धारों) का पुनरुद्धार होता है।
आंदोलन का तरीका और इतिहास
यह अभियान मूल रूप से प्रसिद्ध चिपको आंदोलन और ‘चीड़ हटाओ बांज लगाओ’ जैसे स्थानीय आंदोलनों से उपजा है। [1, 2] - मिट्टी की मरहम-पट्टी: हेवल घाटी के ग्रामीणों ने पेड़ों से अत्यधिक लीसा (Resin) निकालने के विरुद्ध प्रदर्शन किया और पेड़ों को नुकसान से बचाने के लिए उन पर मिट्टी की मरहम-पट्टी की। [1]
- चिपको से प्रेरणा: पेड़ों को बचाने के लिए महिलाओं ने उन्हें राखी बांधी, जो आगे चलकर चिपको आंदोलन की नींव बनी। [1, 2]
- वर्तमान स्थिति: आज भी पर्यावरणविद, जैसे श्री रमेश बौड़ाई जी, इस मुहिम को सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर आगे बढ़ा रहे हैं

