देशभर में भीषण गर्मी से राहत की उम्मीद लेकर आने वाला मानसून इस बार अपनी रफ्तार से लोगों को निराश कर रहा है। जून का आधा महीना गुजर जाने के बावजूद देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से काफी कम हुई है। खेतों में बुवाई की तैयारी कर रहे किसानों से लेकर तपती गर्मी झेल रहे आम लोगों तक, सभी की निगाहें अब आसमान पर टिकी हैं। मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मानसून आगे तो बढ़ रहा है, लेकिन उसकी गति अपेक्षा से काफी धीमी बनी हुई है। ऐसे में वर्षा की कमी को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर में सक्रिय हुई अल नीनो जैसी परिस्थितियों का प्रभाव भारतीय मानसून पर दिखाई देने लगा है। यही वजह है कि देश के अनेक क्षेत्रों में मानसूनी गतिविधियां कमजोर बनी हुई हैं।
भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक जून के पहले पंद्रह दिनों में सामान्य की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। अनुमान है कि अगले कुछ दिनों में यह कमी और बढ़ सकती है, जिससे कृषि क्षेत्र पर भी असर पड़ने की आशंका है। हालांकि सोमवार को मानसून ने कुछ क्षेत्रों में आगे बढ़कर राहत के संकेत जरूर दिए। इस दौरान तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कुछ हिस्सों में मानसून की प्रगति दर्ज की गई। इसके बावजूद देश के बड़े भूभाग में मानसूनी गतिविधियां अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई हैं। कई राज्यों में लोग अब भी बारिश का इंतजार कर रहे हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में भी मानसून की सुस्ती साफ दिखाई दे रही है। सामान्य परिस्थितियों में जहां 11 जून तक मानसून मुंबई पहुंच जाता है, वहीं इस बार शहर को मानसूनी बारिश के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि बादलों के पर्याप्त विकास नहीं होने के कारण वर्षा की स्थिति प्रभावित हो रही है।
उपग्रह चित्रों से भी यही संकेत मिल रहे हैं कि मानसूनी बादल अभी पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाए हैं। केवल अल नीनो ही नहीं, बल्कि वायुमंडल की अन्य परिस्थितियां भी मानसून की धीमी चाल के लिए जिम्मेदार हैं। इस समय ऊपरी वायुमंडल में बहने वाली पश्चिमी हवाएं सामान्य स्थिति से अधिक दक्षिण की ओर खिसक गई हैं। इन हवाओं की तीव्रता के कारण मानसूनी बादलों का निर्माण और उनका लंबे समय तक टिके रहना कठिन हो रहा है। परिणामस्वरूप कई इलाकों में बादल तो बन रहे हैं, लेकिन पर्याप्त वर्षा नहीं हो पा रही है। इस स्थिति का सबसे अधिक प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। देश के अनेक राज्यों में खरीफ फसलों की बुवाई मानसून पर निर्भर करती है। यदि वर्षा में देरी या कमी बनी रहती है तो किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जलाशयों में पानी की उपलब्धता और भूजल स्तर पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है। यही कारण है कि मौसम विभाग और कृषि विशेषज्ञ मानसून की हर गतिविधि पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार- कहां तक पहुंचा मानसून और आगे क्या हैं संकेत?
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 15 जून तक दक्षिण-पश्चिम मानसून ने आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल के शेष हिस्सों को कवर कर लिया है। इसके अलावा तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कुछ नए क्षेत्रों में भी मानसून पहुंच चुका है। वर्तमान में मानसून की उत्तरी सीमा हैदराबाद, भद्राचलम, कोरापुट, रांची, जमुई और मुजफ्फरपुर से होकर गुजर रही है। मौसम विभाग का कहना है कि आगामी चार से पांच दिनों के दौरान मानसून के आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अपेक्षाकृत अनुकूल बनी हुई हैं।
इस अवधि में महाराष्ट्र के शेष हिस्सों, कर्नाटक के बाकी क्षेत्रों, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के बचे हुए भागों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों तथा मध्य अरब सागर के क्षेत्रों तक मानसून के पहुंचने की संभावना है। हालांकि मानसून को वास्तविक गति तभी मिलेगी जब अरब सागर या बंगाल की खाड़ी में कोई मजबूत कम दबाव का क्षेत्र विकसित होगा। सामान्यतः ऐसे मौसमी तंत्र मानसूनी हवाओं को अधिक सक्रिय बनाते हैं और व्यापक क्षेत्रों में वर्षा की संभावना बढ़ाते हैं। फिलहाल ऐसे किसी मजबूत तंत्र के संकेत सीमित हैं, इसलिए मानसून की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है। इसके बावजूद मौसम वैज्ञानिक पूरी तरह निराश नहीं हैं।
विभिन्न मौसम मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि वर्तमान सुस्ती स्थायी नहीं है। आने वाले दिनों में वायुमंडलीय परिस्थितियों में सुधार होने पर मानसून दोबारा रफ्तार पकड़ सकता है। यदि ऐसा होता है तो वर्षा की कमी की भरपाई होने की संभावना भी बनेगी।फिलहाल देश के करोड़ों लोगों की नजरें मानसून की अगली चाल पर टिकी हैं। किसानों को खेतों के लिए पानी चाहिए, शहरों को गर्मी से राहत चाहिए और जल संसाधनों को भरने के लिए अच्छी बारिश की जरूरत है। ऐसे में अगले कुछ दिन यह तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं कि इस वर्ष का मानसून सामान्य रहेगा या फिर अल नीनो का प्रभाव पूरे मौसम पर भारी पड़ेगा।

