महंगाई ने फिर दिखाई तेजी, आम लोगों की थाली हुई और महंगी, जून के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

देश में खाने-पीने की वस्तुओं की लगातार बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। जून महीने के खुदरा महंगाई के ताजा आंकड़ों ने यह संकेत दिया है कि आवश्यक वस्तुओं की महंगाई अभी भी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ सकी है। विशेष रूप से खाद्य पदार्थों की कीमतों में आई तेजी ने परिवारों के मासिक बजट को प्रभावित किया है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक महंगाई को तय दायरे में रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मौसम, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियां आगे भी असर डाल सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा काफी हद तक वर्षा, कृषि उत्पादन और वैश्विक हालात पर निर्भर करेगी। देश में खुदरा महंगाई जून महीने में बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई। इससे पहले मई में यह 3.93 प्रतिशत दर्ज की गई थी। सोमवार को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक महीने के भीतर महंगाई में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका सबसे बड़ा कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में आई तेजी को माना जा रहा है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित आंकड़ों के अनुसार जून में खाद्य महंगाई बढ़कर 5.32 प्रतिशत हो गई, जबकि मई में यह 4.78 प्रतिशत थी। यानी एक महीने में खाद्य महंगाई में आधे प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की रसोई पर पड़ा है। महंगाई बढ़ने का अर्थ है कि लोगों को पहले की तुलना में समान मात्रा में सामान खरीदने के लिए अधिक धन खर्च करना पड़ रहा है। विशेष रूप से मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है क्योंकि उनकी आय की तुलना में दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक को खुदरा महंगाई चार प्रतिशत के आसपास बनाए रखने की जिम्मेदारी दी है। इसके लिए दो प्रतिशत ऊपर और दो प्रतिशत नीचे तक का दायरा तय किया गया है। 

यदि महंगाई इस सीमा से अधिक समय तक बाहर रहती है तो केंद्रीय बैंक को उसके कारण बताने और आवश्यक कदम उठाने होते हैं। हालांकि जून के आंकड़े बाजार की अपेक्षाओं से अधिक रहे, आने वाले समय में महंगाई की स्थिति कुछ बेहतर हो सकती है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अपेक्षा से अधिक गिरावट आई है, जिससे परिवहन और उत्पादन लागत पर दबाव कम होने की संभावना है। इसका लाभ धीरे-धीरे उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। जुलाई के शुरुआती दिनों में हुई अच्छी वर्षा ने जून महीने में वर्षा की कमी से उत्पन्न चिंता को कुछ हद तक कम किया है। यदि आगे भी सामान्य वर्षा होती है तो कृषि उत्पादन बेहतर रहेगा और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति मजबूत होने से कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

पश्चिम एशिया में जारी तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है

अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि महंगाई का भविष्य अभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। पश्चिम एशिया में जारी तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है। यदि वहां की स्थिति और गंभीर होती है तो कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेजी आ सकती है, जिसका असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर भी दिखाई देगा। इसी तरह यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है या वर्षा का वितरण असमान होता है तो फसलों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इससे सब्जियों, दालों, अनाज और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में फिर बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसलिए मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। फिलहाल अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान औसत महंगाई लगभग पांच प्रतिशत के आसपास रह सकती है। यह स्तर केंद्रीय बैंक के लक्ष्य से कुछ अधिक जरूर है, लेकिन इसे फिलहाल बहुत गंभीर स्थिति नहीं माना जा रहा है।  

महंगाई के इन आंकड़ों का असर भारतीय रिजर्व बैंक की आगामी मौद्रिक नीति पर भी पड़ सकता है। माना जा रहा है कि अगस्त में होने वाली अगली नीति समीक्षा बैठक में केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में किसी बड़े बदलाव से बच सकता है। जब तक महंगाई और आर्थिक विकास की दिशा को लेकर अधिक स्पष्ट संकेत नहीं मिलते, तब तक वर्तमान स्थिति को बनाए रखने की संभावना अधिक मानी जा रही है। केंद्रीय बैंक के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर महंगाई को नियंत्रित रखना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति भी बनी रहनी चाहिए। यदि ब्याज दरें बहुत अधिक बढ़ाई जाती हैं तो उद्योग और निवेश प्रभावित हो सकते हैं, जबकि दरों में अधिक राहत देने से महंगाई बढ़ने का जोखिम बना रहता है। 

आने वाले महीनों में खाद्य आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतें, वर्षा की स्थिति और वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यदि इन मोर्चों पर परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं तो महंगाई में धीरे-धीरे कमी आ सकती है। फिलहाल जून के आंकड़े यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतें अभी भी आम लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। सरकार, केंद्रीय बैंक और नीति निर्माता आने वाले महीनों में महंगाई पर लगातार नजर रखेंगे ताकि कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखा जा सके और आम नागरिकों को राहत मिल सके। वहीं उपभोक्ताओं की उम्मीद भी यही है कि खाद्य पदार्थों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में जल्द स्थिरता आए, जिससे घरेलू बजट पर बढ़ता दबाव कम हो सके।

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