डिजिटल गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- इसे अलग अपराध घोषित कर कठोर सजा का हो प्रावधान

देशभर में तेजी से बढ़ रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर ठगी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। सर्वोच्च न्यायालय ने संकेत दिया कि केंद्र सरकार को आपराधिक कानूनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ को एक अलग और विशिष्ट अपराध के रूप में शामिल करने पर विचार करना चाहिए। अदालत का मानना है कि इस प्रकार के अपराधों की प्रकृति पारंपरिक अपराधों से अलग है, इसलिए इनके लिए विशेष कानूनी प्रावधान और कठोर दंड व्यवस्था आवश्यक हो सकती है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ डिजिटल गिरफ्तारी घोटालों और साइबर माध्यम से होने वाली धोखाधड़ी की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि वर्तमान कानूनों में ऐसे अपराधों को जबरन वसूली, धोखाधड़ी या डकैती जैसे अपराधों की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन अपराध की बदलती प्रकृति को देखते हुए इनके लिए अलग कानूनी पहचान जरूरी हो सकती है।

अदालत ने यह भी कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में अपराधी आधुनिक तकनीक का उपयोग कर लोगों को मानसिक रूप से बंधक बनाते हैं और भय का वातावरण पैदा करके उनसे धन ऐंठते हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह किसी गंभीर कानूनी कार्रवाई के दायरे में है और उससे बचने के लिए तत्काल धनराशि जमा करनी होगी। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव का फायदा उठाकर ठग लोगों से लाखों-करोड़ों रुपये की ठगी कर लेते हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या अब समय नहीं आ गया है कि दंड कानूनों में डिजिटल अरेस्ट को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए। उन्होंने कहा कि इन मामलों में जबरन वसूली और डकैती जैसे अपराधों के तत्व तो मौजूद हैं, लेकिन फिर भी इसे स्वतंत्र अपराध के रूप में परिभाषित करने की आवश्यकता महसूस होती है। यदि ऐसा किया जाता है तो अपराधियों के खिलाफ अधिक प्रभावी कार्रवाई संभव होगी और जांच एजेंसियों को भी स्पष्ट कानूनी आधार मिलेगा।

पीठ ने यह भी सुझाव दिया कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध हों तो उसकी संपत्तियों को अस्थायी रूप से फ्रीज या जब्त करने का अधिकार भी जांच एजेंसियों को दिया जाना चाहिए। अदालत का मानना है कि साइबर अपराधों से अर्जित धन को तुरंत सुरक्षित करना आवश्यक है, ताकि अपराधी धन को इधर-उधर स्थानांतरित कर जांच को प्रभावित न कर सकें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साइबर अपराधों की बढ़ती घटनाओं ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अपराधी अब तकनीक का उपयोग कर देश के किसी भी हिस्से में बैठे व्यक्ति को निशाना बना सकते हैं। कई मामलों में अपराधी विदेशों में बैठे होते हैं, जिससे जांच और अभियोजन की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है। ऐसे में कानूनों को समय के अनुरूप अद्यतन करना आवश्यक है।

बदलती तकनीक के साथ कानूनों में बदलाव की जरूरत

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि तकनीक के विकास के साथ अपराधों के स्वरूप में लगातार बदलाव आ रहा है। पहले जहां अपराध भौतिक रूप से किए जाते थे, वहीं अब मोबाइल फोन, इंटरनेट, वीडियो कॉल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। डिजिटल अरेस्ट के मामलों में ठग स्वयं को पुलिस अधिकारी, सीबीआई अधिकारी, आयकर अधिकारी या अन्य सरकारी एजेंसी का प्रतिनिधि बताकर लोगों को डराते हैं। इसके बाद उन्हें वीडियो कॉल पर घंटों तक निगरानी में रखने का नाटक किया जाता है और कानूनी कार्रवाई का भय दिखाकर पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में पीड़ित केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं झेलता, बल्कि मानसिक तनाव और सामाजिक भय का भी सामना करता है। इसलिए इन अपराधों को सामान्य साइबर धोखाधड़ी के मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता। इनकी गंभीरता को देखते हुए अलग कानूनी प्रावधान और सख्त दंड व्यवस्था आवश्यक हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देशभर में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। गृह मंत्रालय और विभिन्न जांच एजेंसियां भी समय-समय पर लोगों को जागरूक करती रही हैं कि कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं कर सकती। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग ठगी का शिकार हो रहे हैं। यदि डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध के रूप में कानूनी मान्यता दी जाती है तो इससे न केवल अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई संभव होगी, बल्कि जांच एजेंसियों को भी ऐसे मामलों में तेजी से कार्रवाई करने का अधिकार मिलेगा। साथ ही पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी हो सकेगी।

अब इस मामले में केंद्र सरकार का रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि सरकार अदालत के सुझावों पर विचार करती है और आवश्यक कानूनी संशोधन लाती है तो डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों पर अंकुश लगाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बदलते दौर के अपराधों से निपटने के लिए कानूनों को भी आधुनिक और प्रभावी बनाना समय की मांग है।

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