साइबर ठगी से रकम निकालने वालों तक पहुंची उत्तराखंड पुलिस, अपराध की पूरी कड़ी बेनकाब

साइबर ठगों के खिलाफ उत्तराखंड पुलिस ने अब तक की सबसे व्यापक और सुनियोजित कार्रवाई में से एक को अंजाम देते हुए अपराध की पूरी कड़ी पर एक साथ प्रहार किया है। ठगी करने वालों से लेकर ठगी की रकम लेने वाले, उसे अलग-अलग खातों में घुमाने वाले, एटीएम से नकदी निकालने वाले और अपराधियों को संदिग्ध सिम उपलब्ध कराने वालों तक पुलिस ने अपना शिकंजा कस दिया है। सात दिन तक चले विशेष अभियान में प्रदेशभर में संदिग्ध बैंक खातों, नकदी निकासी स्थलों, सिम, मोबाइल पहचान संख्या और अन्य संदिग्ध ठिकानों की गहन पड़ताल की गई। पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर 24 अगस्त से 1 सितंबर तक चलाए गए ‘अभियान हॉटस्पॉट’ के तहत विशेष कार्यबल, साइबर अपराध इकाइयों, जिला साइबर प्रकोष्ठों और जनपद पुलिस ने मिलकर कार्रवाई की। अभियान के दौरान 820 संदिग्ध बैंक खातों का सत्यापन किया गया, जिनके आधार पर 159 मुकदमे दर्ज किए गए। वहीं 1,236 एटीएम से धन निकासी से जुड़े मामलों या स्थानों की जांच में 32 मुकदमे दर्ज हुए। 84 चेक से धन निकासी के मामलों की पड़ताल की गई और 37 मुकदमे दर्ज किए गए। साइबर अपराध में इस्तेमाल 644 संदिग्ध सिम और 630 मोबाइल पहचान संख्याओं को बंद कराया गया। 442 संदिग्ध मामलों का सत्यापन भी किया गया। इसके अलावा 22 संदिग्ध सिम बिक्री केंद्रों की जांच में 10 मुकदमे दर्ज किए गए। अभियान में अब तक 10 साइबर अपराधियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। 

इस पूरी कार्रवाई की खास बात यह रही कि पुलिस ने केवल अपराध करने वाले व्यक्ति तक पहुंचने के बजाय उसके पीछे काम कर रहे पूरे आर्थिक और तकनीकी तंत्र को निशाना बनाया। साइबर ठगी में आमतौर पर पीड़ित से धन हासिल करने के बाद उसे ऐसे बैंक खातों में भेजा जाता है जिनका इस्तेमाल दूसरे लोग करते हैं। इन खातों को सामान्य भाषा में धन वाहक खाते कहा जा सकता है। इसके बाद रकम को कई खातों में भेजकर उसका पता लगाना मुश्किल किया जाता है और फिर एटीएम या चेक के जरिए नकदी निकाल ली जाती है। पुलिस ने इसी पूरी प्रक्रिया को तोड़ने के लिए बैंक खातों से लेकर नकदी निकासी और दूरसंचार साधनों तक एक साथ कार्रवाई की। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र, दूरसंचार विभाग, भारतीय रिजर्व बैंक और अन्य संस्थाओं से प्राप्त तकनीकी तथा वित्तीय सूचनाओं का विश्लेषण कर संदिग्धों की पहचान की गई। इससे पहले 1 जुलाई से 31 जुलाई तक चलाए गए साइबर सुरक्षा अभियान में डिजिटल, दूरसंचार और वित्तीय संकेतकों का विस्तृत अध्ययन किया गया था। 

विभिन्न स्रोतों से मिली सूचनाओं को आपस में जोड़कर ऐसे संदिग्ध व्यक्ति, खाते, मोबाइल नंबर और स्थान चिन्हित किए गए, जिनका संबंध साइबर अपराध से होने की आशंका थी। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के ‘प्रतिबिंब मानचित्र’ के माध्यम से साइबर अपराध से जुड़े डिजिटल, दूरसंचार, वित्तीय और भौगोलिक संकेतकों को आपस में जोड़कर संदिग्ध कड़ियों की पहचान की गई। इसके बाद पुलिस ने इन चिन्हित स्थानों पर जाकर सत्यापन, पूछताछ, तलाशी, साक्ष्य जुटाने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की। अभियान का उद्देश्य साफ था, साइबर ठगी के बाद पैसे के सफर को रोकना और अपराधियों को संसाधन उपलब्ध कराने वाली पूरी व्यवस्था को ध्वस्त करना। इसी रणनीति के तहत धन वाहक खातों, एटीएम, चेक से निकासी, संदिग्ध सिम और उनके विक्रय केंद्रों पर एक साथ कार्रवाई की गई। पुलिस की यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि साइबर अपराध से निपटने के लिए अब केवल शिकायत दर्ज करना पर्याप्त नहीं माना जा रहा, बल्कि अपराध से पहले और अपराध के बाद इस्तेमाल होने वाले पूरे तंत्र की पहचान कर उस पर कार्रवाई की जा रही है।

अभियान हॉटस्पॉट’ के दौरान हरिद्वार में 200 से ज्यादा खातों का जाल

‘अभियान हॉटस्पॉट’ के दौरान हरिद्वार में पुलिस को बड़ी सफलता मिली। श्यामपुर थाना पुलिस ने धन वाहक खातों, एटीएम से निकासी, संदिग्ध सिम और चेक से धन निकासी से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण कर संगठित साइबर ठगी गिरोह का पर्दाफाश किया। पुलिस ने गिरोह के पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया। जांच में इस नेटवर्क से जुड़े 200 से अधिक बैंक खाते सामने आए, जिनमें साइबर ठगी की रकम का सीधे शुरुआती स्तर पर लेन-देन पाया गया। आरोपियों के कब्जे से 45 से अधिक एटीएम कार्ड, 20 बैंक पासबुक, दो कंप्यूटर और 17 मोबाइल फोन बरामद किए गए। जांच में पता चला कि नौकरी, ऑनलाइन व्यापार और पैसा दोगुना करने जैसे लालच देकर लोगों से ठगी की जाती थी। ठगी की रकम को धन वाहक खातों में मंगाने के बाद एटीएम से नकदी निकाली जाती या दूसरे खातों में जमा कराकर रकम का रास्ता बदल दिया जाता था। इस मामले में मथुरा में भी गिरफ्तारी की गई है, जबकि गिरोह से जुड़े अन्य आरोपियों की तलाश बिहार के नवादा में जारी है। हरिद्वार के पथरी थाना क्षेत्र में भी एटीएम से निकासी के आधार पर दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। 

पुलिस के अनुसार इनके खातों में साइबर ठगी की रकम पहुंचती थी और वे पांच प्रतिशत कमीशन लेकर एटीएम से रकम निकालते थे। वहीं पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार में विदेशी मुद्रा कारोबार के नाम पर 3.86 लाख रुपये की ठगी के मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया। जांच में उसके आठ बैंक खातों में करीब डेढ़ करोड़ रुपये की संदिग्ध रकम पहुंचने की बात सामने आई। करीब सात लाख रुपये की राशि फिलहाल रोक दी गई है। आरोपी के खिलाफ विभिन्न राज्यों से 19 शिकायतें भी दर्ज मिलीं, जिनमें करीब 32.18 लाख रुपये की रकम से जुड़े मामले शामिल हैं। पुलिस की अंतरराज्यीय जांच भी इस अभियान का अहम हिस्सा रही। वर्ष 2026 में 240 साइबर अपराधियों और संदिग्धों की जानकारी समन्वय पोर्टल पर दर्ज की गई। अलग-अलग राज्यों के मामलों से मिलान करने पर 100 से अधिक अंतरराज्यीय संबंध सामने आए। इसके आधार पर दूसरे राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय कर आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी की कार्रवाई की जा रही है। 

साइबर जांच में दूसरे राज्यों से सहयोग लेने के लिए 303 नोटिस भेजे गए, जबकि अन्य राज्यों से उत्तराखंड को प्राप्त 247 नोटिस की तामील कराई गई। इससे साफ है कि साइबर अपराध का नेटवर्क राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं है और पुलिस भी अब उसी स्तर पर अंतरराज्यीय समन्वय के साथ कार्रवाई कर रही है। उत्तराखंड पुलिस ने साइबर अपराध के खिलाफ कार्रवाई को केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रखा है। ठगी की रकम को समय रहते रोकने और आम लोगों को जागरूक करने पर भी लगातार जोर दिया जा रहा है। 

वर्ष 2026 में राष्ट्रीय साइबर अपराध शिकायत मंच और 1930 हेल्पलाइन पर मिली 18,749 शिकायतों पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के सहयोग से करीब 23.44 करोड़ रुपये की ठगी की रकम को रोकने या सुरक्षित कराने में सफलता हासिल की। इसी अवधि में प्राप्त 683 प्रारंभिक शिकायतों में से 659 को नियमित मुकदमों से जोड़ा गया। पुलिस का कहना है कि वित्तीय साइबर ठगी होने के तुरंत बाद 1930 पर सूचना देने से रकम के आगे स्थानांतरण को रोकने की संभावना बढ़ जाती है। 

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