ब्रिक्स में बनी सहमति, आज जारी होगा नई दिल्ली घोषणापत्र, आक्रामकता की निंदा और बातचीत से समाधान पर जोर

भारत की अध्यक्षता में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच शनिवार को बड़ी कूटनीतिक कामयाबी सामने आई है। ब्रिक्स देशों के बीच साझा बयान को लेकर सहमति बन गई है और नई दिल्ली घोषणापत्र जारी करने की तैयारी पूरी हो गई है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच इस सहमति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। घोषणापत्र में किसी देश का नाम लिए बिना हर तरह की आक्रामकता की निंदा किए जाने की बात सामने आई है। इसके साथ ही टकराव खत्म करने के लिए बातचीत और कूटनीति को आगे का रास्ता बताया जाएगा। भारत के लिए यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया वैश्विक शांति, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय सहयोग को लेकर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है।

भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। दो दिवसीय सम्मेलन में ब्रिक्स सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ सहयोगी देशों और विशेष आमंत्रित मेहमानों की भागीदारी हो रही है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन की थीम ‘रेजिलियंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी’ यानी लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास रखी गई है। इस थीम का मूल भाव मानवता को प्राथमिकता देना और समावेशी वैश्विक विकास को आगे बढ़ाना है।

शिखर सम्मेलन की सबसे अहम उपलब्धियों में साझा घोषणापत्र पर सहमति को देखा जा रहा है। ब्रिक्स समूह में शामिल देशों के बीच अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचारों में अंतर रहा है। खासकर पश्चिम एशिया के संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव को लेकर सदस्य देशों की अपनी-अपनी चिंताएं हैं। ऐसे में सभी देशों को एक साझा बयान पर सहमत करना भारत की अध्यक्षता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। घोषणापत्र में किसी देश का नाम लिए बिना हर तरह की आक्रामकता की निंदा किए जाने की बात कही गई है। यह रुख अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से सुलझाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं है। इससे ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार मार्गों, वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर भी असर पड़ रहा है। ऐसे समय में ब्रिक्स जैसे बड़े समूह की ओर से शांति, संवाद और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिए जाने का अपना महत्व है। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और बातचीत के पक्ष में अपनी भूमिका रखता आया है। नई दिल्ली घोषणापत्र में भी इसी सोच की झलक देखने को मिल सकती है।

भारत की अध्यक्षता में आयोजित सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, बहुपक्षवाद को मजबूत करने, व्यापार और निवेश बढ़ाने, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक और आपूर्ति शृंखला जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है। दुनिया में बदलते आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों के बीच ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करना सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य है। समूह के सदस्य देश वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने और विकासशील देशों की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक प्रभावी ढंग से उठाने पर भी जोर दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में भारत की अध्यक्षता को मानवता-प्रथम और जन-केंद्रित सोच पर आधारित बताया। उन्होंने कहा कि भारत की प्राथमिकता ऐसी साझेदारी को आगे बढ़ाना है, जिससे आम लोगों के जीवन में सुधार आए और विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचे। भारत की अध्यक्षता के दौरान विज्ञान, तकनीक, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण और आर्थिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में कई पहल की गई हैं। इन प्रयासों को शिखर सम्मेलन के व्यापक एजेंडे से जोड़कर देखा जा रहा है।

सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा और अन्य प्रमुख नेता हिस्सा ले रहे हैं। ब्रिक्स के विस्तारित स्वरूप में अब कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इससे समूह का वैश्विक प्रभाव और प्रतिनिधित्व बढ़ा है। भारत की कोशिश है कि इस मंच का उपयोग विकासशील देशों के हितों, आर्थिक सहयोग और वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए किया जाए।

प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता की। दोनों नेताओं ने भारत-रूस संबंधों को और मजबूत करने तथा व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। बदलते वैश्विक हालात के बीच दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने के प्रयास भी जारी हैं।

प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात पर दुनिया की नजर

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक पर भी पूरी दुनिया की नजर है। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग शनिवार को नई दिल्ली पहुंच गए। उनका विमान दिल्ली के पालम एयरबेस पर उतरा। भारत यात्रा के दौरान वह प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। दोनों नेताओं की मुलाकात को भारत-चीन संबंधों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। भारत और चीन के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। सीमा विवाद के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा था। हालांकि, पिछले कुछ समय से संबंधों में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात को संवाद और सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। बैठक में द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ संबंधों को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में भारत और संयुक्त अरब अमीरात के संबंधों में बड़ा बदलाव आया है। 

दोनों देश अब और ऊंचे लक्ष्य तय कर रहे हैं तथा रक्षा, एआई, अंतरिक्ष, महत्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अपनी रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाना चाहते हैं। भारत की विदेश नीति में खाड़ी क्षेत्र के देशों के साथ संबंधों का विशेष महत्व है। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और निवेश के लिहाज से भी यह साझेदारी महत्वपूर्ण है। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है। वैश्विक व्यापार में बदलते समीकरणों, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच ब्रिक्स देशों के लिए आपसी सहयोग बढ़ाना जरूरी हो गया है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन में व्यापार, निवेश, तकनीक और आर्थिक विकास के नए अवसर तलाशने पर चर्चा हो रही है।

सम्मेलन का एक प्रमुख उद्देश्य वैश्विक दक्षिण के देशों की आवाज को मजबूत करना भी है। विकासशील देश लंबे समय से वैश्विक वित्तीय संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करते रहे हैं। ब्रिक्स मंच के माध्यम से इन देशों की चिंताओं को सामने लाने और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की दिशा में काम करने पर जोर दिया जा रहा है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है। पश्चिम एशिया का संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा मार्गों में व्यवधान, व्यापारिक तनाव और वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता जैसे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत को और बढ़ा रहे हैं। ऐसे में साझा घोषणापत्र पर सहमति बनना ब्रिक्स की एकजुटता का संकेत माना जा रहा है।

नई दिल्ली घोषणापत्र में शांति, सहयोग, विकास और बहुपक्षवाद को लेकर साझा प्रतिबद्धता सामने आने की उम्मीद है। भारत के लिए यह सम्मेलन अपनी कूटनीतिक भूमिका को मजबूत करने और वैश्विक मंच पर विकासशील देशों की आवाज को प्रभावी ढंग से उठाने का अवसर भी है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि घोषणापत्र में किन मुद्दों को प्रमुखता दी जाती है और सदस्य देश वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह की साझा दिशा तय करते हैं।

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