गुजरात में अब शादी, तलाक और लिव-इन से जुड़े नियम बदलने की तैयारी है। समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद राज्य में इसे लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। 1 अक्टूबर को गुजरात के राजपत्र में यूसीसी-2026 के प्रकाशित होने के साथ ही यह कानून अब अगले चरण में पहुंच गया है। हालांकि, आम लोगों पर इसके प्रावधान कब से लागू होंगे, यह राज्य सरकार की ओर से जारी होने वाली अधिसूचना में तय किया जाएगा। मार्च 2026 में गुजरात विधानसभा ने यूसीसी विधेयक पारित किया था और केंद्र सरकार ने भी उस समय इसे उत्तराखंड के बाद गुजरात में समान नागरिक संहिता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया था। गुजरात का यूसीसी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों को एक समान कानूनी ढांचे में लाने की कोशिश करता है। विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में विवाह का अनिवार्य पंजीकरण, एक से अधिक विवाह पर रोक, तलाक के लिए समान प्रक्रिया और लिव-इन संबंधों के पंजीकरण से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। कानून लागू होने के बाद गुजरात में अलग-अलग धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के बजाय यूसीसी के दायरे में आने वाले मामलों के लिए एक समान व्यवस्था लागू होगी।
गुजरात विधानसभा में विधेयक पारित होने के समय सरकार ने इसे व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता लाने वाला कदम बताया था। वहीं विपक्ष ने विधेयक के विभिन्न प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी। विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया था। केंद्र सरकार की ओर से 25 मार्च 2026 को जारी बयान में भी गुजरात को उत्तराखंड के बाद यूसीसी विधेयक पारित करने वाला राज्य बताया गया था। यूसीसी लागू होने के बाद विवाह का पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार विवाह संपन्न होने के 60 दिनों के भीतर संबंधित प्राधिकारी के समक्ष विवाह का विवरण या पंजीकरण के लिए आवश्यक आवेदन जमा करना होगा। निर्धारित अवधि में पंजीकरण नहीं कराने पर आर्थिक दंड का प्रावधान रखा गया है। उपलब्ध विधेयक संबंधी विवरणों में विवाह पंजीकरण की समय सीमा 60 दिन बताई गई है और गैर-पंजीकरण पर जुर्माने का प्रावधान है।
विवाह की प्रक्रिया में धार्मिक रीति-रिवाजों पर पूरी तरह रोक लगाने की बात नहीं है। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार अलग-अलग समुदाय अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह कर सकेंगे, लेकिन विवाह को कानूनी रूप से दर्ज कराने की प्रक्रिया समान होगी। इस तरह विवाह की रस्में अलग हो सकती हैं, लेकिन उसके कानूनी पंजीकरण का ढांचा एक समान रखने की व्यवस्था की गई है। यूसीसी में एक महत्वपूर्ण बदलाव एक से अधिक विवाह को लेकर भी है। विधेयक में एक विवाह के रहते दूसरा विवाह करने पर रोक का प्रावधान है। यानी विवाह की वैधता के लिए यह शर्त रखी गई है कि विवाह के समय किसी भी पक्ष का पहले से कोई जीवित जीवनसाथी नहीं होना चाहिए। इस व्यवस्था के जरिए बहुविवाह पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है।
लिव-इन संबंधों का भी होगा पंजीकरण, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों से जुड़े प्रावधान
गुजरात के यूसीसी में लिव-इन संबंधों को भी कानूनी प्रक्रिया के दायरे में लाने की व्यवस्था की गई है। इसके तहत लिव-इन संबंध शुरू करने और समाप्त करने से संबंधित जानकारी निर्धारित प्राधिकारी को देने या उसका पंजीकरण कराने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य ऐसे संबंधों में रहने वाले पक्षों की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करना और विवाद की स्थिति में रिकॉर्ड उपलब्ध कराना बताया गया है। लिव-इन संबंध से पैदा होने वाले बच्चे के अधिकारों को भी कानून के दायरे में संरक्षण दिया गया है। महिला साथी के अधिकारों और भरण-पोषण से जुड़े प्रावधान भी इसमें शामिल हैं। यदि पुरुष साथी महिला को छोड़ देता है तो परिस्थितियों के अनुसार महिला को भरण-पोषण का दावा करने का कानूनी अधिकार मिल सकता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण देना है।
लिव-इन संबंधों के पंजीकरण के दौरान गलत जानकारी देने या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने पर भी दंड का प्रावधान रखा गया है। उपलब्ध विधेयक संबंधी विवरणों के मुताबिक झूठी जानकारी देने पर तीन महीने तक की सजा या 25 हजार रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान हो सकता है। निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने की स्थिति में भी कानून के तहत कार्रवाई की व्यवस्था है। नाबालिगों से जुड़े लिव-इन संबंधों को लेकर भी यूसीसी में सख्त प्रावधान हैं। कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नाबालिगों को ऐसे संबंधों के नाम पर कानूनी या सामाजिक शोषण का सामना न करना पड़े। इसके अलावा जबरदस्ती, धोखे या गलत जानकारी के आधार पर संबंध बनाने जैसे मामलों के लिए भी अलग-अलग दंडात्मक व्यवस्थाएं रखी गई हैं।
उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में भी समानता पर जोर दिया गया है। यूसीसी का व्यापक उद्देश्य व्यक्तिगत मामलों से जुड़े अलग-अलग कानूनी प्रावधानों को एक समान ढांचे में लाना है। हालांकि, अनुसूचित जनजातियों और संविधान के तहत जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकार संरक्षित हैं, उन्हें इसके दायरे से बाहर रखने का प्रावधान किया गया है। गुजरात में यूसीसी की यह पूरी व्यवस्था फिलहाल राज्य सरकार की प्रभावी अधिसूचना पर निर्भर करेगी। राष्ट्रपति की मंजूरी और राजपत्र प्रकाशन के बाद अगला अहम कदम सरकार की ओर से वह अधिसूचना होगी, जिसमें कानून के लागू होने की तारीख घोषित की जाएगी। इसलिए जब तक वह प्रभावी तिथि अधिसूचित नहीं होती, तब तक नए प्रावधानों को पूरी तरह लागू कानून के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
गुजरात के बाद देश में यूसीसी को लेकर राज्यों की गतिविधियां भी तेज हुई हैं। उत्तराखंड ने 2024 में यूसीसी लागू किया था, जबकि गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में अपना विधेयक पारित किया। इसके बाद असम समेत अन्य राज्यों ने भी समान नागरिक संहिता से जुड़े विधायी कदम आगे बढ़ाए। इस लिहाज से गुजरात का कानून व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता की दिशा में राज्य स्तर पर चल रही बड़ी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।

