उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। जनता और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सक्रियता बढ़ाने के लिए ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ पर निकले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को आखिरकार अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। पार्टी के भीतर बढ़ते विरोध, प्रदेश संगठन की असहजता और दिल्ली में बैठे कांग्रेस नेतृत्व की नाराजगी के बीच रावत ने प्रस्तावित नौ यात्राओं को फिलहाल स्थगित करने का ऐलान कर दिया है। जिस अभियान को लेकर उन्होंने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा की थी, वह दो कार्यक्रमों के बाद ही थम गया। इसे केवल एक यात्रा स्थगित करने का फैसला मानना मुश्किल है। इसके पीछे कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान, संगठनात्मक अनुशासन का सवाल और चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिशों के बीच पैदा हुआ टकराव भी साफ दिखाई दे रहा है। हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट के जरिए यात्राएं स्थगित करने की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि नौ और धन्यवाद यात्राओं की योजना बनाई गई थी। इन कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए कार्यकर्ताओं और सहयोगियों को जिम्मेदारियां भी सौंप दी गई थीं, लेकिन अब उन्हें रोकने का निर्णय लिया गया है। रावत ने यात्राओं के आयोजकों और कार्यकर्ताओं को हुई परेशानी के लिए खेद जताते हुए यह भी उम्मीद व्यक्त की कि कांग्रेस संगठन उनकी यात्रा की तर्ज पर कोई जनसंवाद कार्यक्रम तैयार करेगा, जिसमें वह स्वयं भी शामिल होंगे। उनका यह संदेश राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। एक तरफ उन्होंने यात्रा रोकने का फैसला किया, तो दूसरी तरफ पार्टी संगठन से आगे आकर जनसंवाद का कार्यक्रम बनाने की अपेक्षा भी जता दी। यानी अभियान थमा है, लेकिन जनता के बीच सक्रिय रहने और संगठन की भूमिका पर सवाल अब भी कायम हैं।
दो यात्राओं के बाद ही पूर्व मुख्यमंत्री हरदा का थम गया अभियान
हरीश रावत ने अपनी ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ की शुरुआत एक अक्टूबर को हरिद्वार से की थी। इसके बाद पांच अक्टूबर को हल्द्वानी में दूसरा कार्यक्रम आयोजित किया गया। दोनों जगह समर्थकों और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने इस अभियान को चर्चा में ला दिया। रावत का उद्देश्य जनता और कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचकर संवाद स्थापित करना तथा अपनी राजनीतिक सक्रियता को नई धार देना माना जा रहा था। विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह के कार्यक्रमों के जरिए वह प्रदेश की राजनीति में अपनी भूमिका और प्रभाव को भी रेखांकित कर रहे थे।
लेकिन यात्रा का राजनीतिक संदेश जितनी तेजी से बाहर पहुंचा, उतनी ही तेजी से कांग्रेस के भीतर असहजता भी बढ़ने लगी।
सवाल उठने लगे कि क्या प्रदेश संगठन की सहमति और निर्धारित कार्यक्रमों के समानांतर इस तरह की यात्राएं पार्टी की सामूहिक रणनीति को प्रभावित नहीं करेंगी? क्या चुनाव से पहले कांग्रेस को एकजुट दिखाने की कोशिशों के बीच अलग-अलग नेताओं के स्वतंत्र अभियान राजनीतिक भ्रम पैदा नहीं करेंगे? इन सवालों ने धीरे-धीरे यात्रा को जनसंवाद के कार्यक्रम से आगे बढ़ाकर संगठनात्मक अधिकार और नेतृत्व के प्रभाव की बहस में खड़ा कर दिया। हरीश रावत जैसे वरिष्ठ नेता की राजनीतिक हैसियत को देखते हुए इस विवाद को हल्के में लेना भी आसान नहीं था। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में उनकी अपनी पहचान और समर्थकों का आधार है। यही वजह है कि उनके कार्यक्रमों में जुटने वाली भीड़ राजनीतिक संदेश दे रही थी, लेकिन संगठन के लिए यही सक्रियता असहजता का कारण भी बनती दिखाई दी। ऐसे में बाकी नौ यात्राओं को रोकने का फैसला इस बात का संकेत है कि फिलहाल रावत टकराव को आगे बढ़ाने के बजाय पार्टी नेतृत्व के अगले कदम का इंतजार करना चाहते हैं।
हरीश रावत को दिल्ली की नाराजगी के आगे झुकना पड़ा?
यात्रा को लेकर विवाद उस समय और गहरा गया, जब प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा की आपत्ति से जुड़ा पत्र सामने आया। इसके बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल की नाराजगी की चर्चाओं ने भी मामले को तूल दिया। पार्टी के भीतर यह संदेश गया कि संगठन से अलग समानांतर कार्यक्रम चलाना नेतृत्व को स्वीकार्य नहीं है। प्रदेश संगठन की ओर से भी इस मामले को हाईकमान से जुड़ा विषय बताकर दूरी बनाए रखने की कोशिश दिखाई दी। इसी घटनाक्रम के बीच हरीश रावत का यात्रा स्थगित करने का फैसला सामने आया। राजनीतिक दृष्टि से इसे दिल्ली के दबाव के आगे कदम पीछे खींचने के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि रावत ने अपने संदेश में सीधे तौर पर किसी दबाव का उल्लेख नहीं किया, लेकिन घटनाक्रम का क्रम अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
पहले यात्रा शुरू हुई, फिर संगठन के भीतर आपत्तियां उठीं, हाईकमान की नाराजगी की खबरें सामने आईं और आखिरकार प्रस्तावित कार्यक्रम रोकने का ऐलान कर दिया गया। यहां सवाल केवल नौ यात्राओं के स्थगित होने का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संदेश का भी है जो इस घटनाक्रम से निकला है। चुनाव से पहले कांग्रेस अपने नेताओं को एक मंच पर रखने और संगठनात्मक अनुशासन बनाए रखने की कोशिश कर रही है। ऐसे समय में वरिष्ठ नेता का स्वतंत्र अभियान पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर, रावत की सक्रियता को उनके समर्थक जनता के बीच उनकी मजबूत मौजूदगी के रूप में देखते हैं। यही दोनों दृष्टिकोण इस पूरे विवाद की जड़ में हैं। हरीश रावत ने फिलहाल विवाद को विराम देने का रास्ता चुना है। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस नेतृत्व उनके सुझाव पर कोई साझा जनसंवाद कार्यक्रम बनाता है या नहीं। यदि ऐसा होता है, तो इसे संगठन और वरिष्ठ नेता के बीच तालमेल की कोशिश माना जाएगा।
यदि ऐसा नहीं होता, तो यात्रा स्थगित होने के बावजूद दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक दूरी की चर्चा बनी रह सकती है। हरीश रावत की राजनीति में सक्रियता के साथ उनके बयान भी अक्सर चर्चा का विषय बनते रहे हैं। उत्तराखंड कांग्रेस में नेतृत्व, चुनावी रणनीति और पार्टी की दिशा से जुड़े मुद्दों पर उनकी टिप्पणियां कई बार नई बहस छेड़ देती हैं। उनके बयान समर्थकों में उत्साह पैदा कर सकते हैं, लेकिन चुनावी तैयारियों में जुटे प्रदेश संगठन के सामने असहजता भी खड़ी करते हैं। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए यह संतुलन बेहद अहम है। पार्टी एक ओर भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बनाना चाहती है, वहीं दूसरी ओर उसे अपने वरिष्ठ नेताओं की महत्वाकांक्षाओं, राजनीतिक प्रभाव और सार्वजनिक बयानों के बीच तालमेल भी बैठाना है। वहीं धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर कांग्रेस हाईकमान की नाराजगी के बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की गुरुवार को राष्ट्रीय महासचिव संगठन केसी वेणुगोपाल से मुलाकात नहीं हो सकी। रावत दो दिन से दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। उनकी प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा से मुलाकात प्रस्तावित है।

