असम के साहित्यिक क्षेत्र के राजदूत के रूप में विख्यात, प्रसिद्ध साहित्यकार और पद्मश्री अरूप कुमार दत्ता ने जीवन के 80 वर्ष पूरे कर लिए हैं। आज उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके नवीनतम उपन्यास “Leaves No Longer Green” का विमोचन किया गया। भारत के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान “हार्पर कॉलिन्स इंडिया” द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास का विमोचन गुवाहाटी के खानापारा स्थित ‘द लिली होटल’ में आयोजित एक गरिमामयी समारोह में किया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने इस अवसर पर कहा:
”अरूप कुमार दत्ता का व्यक्तित्व और साहित्य हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी रचनाओं में असम का समाज और सभ्यता झलकती है। एक लेखक के रूप में मातृभूमि के प्रति उनकी कर्तव्यनिष्ठा ने उनके साहित्यिक कार्यों को एक नई ऊंचाई दी है। चाय श्रमिकों के कारण ही असम का समग्र विकास संभव हो पाया है। चाय उद्योग के 200 वर्ष पूरे होने के समय अरूप कुमार दत्ता ने चाय श्रमिकों के दर्दनाक इतिहास को आधार बनाकर ‘Leaves No Longer Green’ की रचना की है, जो कि बेहद महत्वपूर्ण है। इस कृति का गहरा मूल्यांकन होना चाहिए। यह रचना निश्चित रूप से नई पीढ़ी पर एक स्थायी प्रभाव छोड़ेगी। अरूप कुमार दत्ता की साहित्यिक यात्रा वास्तव में राष्ट्रीय प्रतिबद्धता की एक उल्लेखनीय यात्रा है।”
समारोह में सम्मानित अतिथि के रूप में रॉयल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के कुलपति और प्रख्यात शिक्षाविद डॉ. अलक बुढ़ागोहाईं ने भाग लिया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि अरूप कुमार दत्ता प्रतिभा, दूरदर्शिता और साहस का अनूठा संगम हैं। उन्होंने असम से जुड़े जिन विषयों पर अंग्रेजी में साहित्य रचा है, उन्होंने असम को क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर निकालकर वैश्विक स्तर पर स्थापित किया है। उनकी रचनाएं गहन शोध का परिणाम हैं। अस्सी वर्ष की आयु में भी वे जिस उत्साह के साथ साहित्य सृजन में लीन हैं, वह हमारी युवा पीढ़ी के लिए निश्चित रूप से एक आदर्श है।
एक अन्य सम्मानित अतिथि, असम साहित्य सभा के पूर्व अध्यक्ष और कथाशिल्पी कुलधर सैकिया ने कहा:
”अरूप कुमार दत्ता एक सदाबहार लेखक हैं। उनका भाषा पर बेहतरीन नियंत्रण है। विशेष रूप से अंग्रेजी भाषा में साहित्य साधना कर उन्होंने असम और पूरे पूर्वोत्तर का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने इतिहास को अपने शोध के जरिए नए रूप में जीवंत कर दिया है।”
सभा में सम्मानित अतिथि के रूप में उपस्थित ‘द असम ट्रिब्यून’ अखबार के कार्यकारी संपादक और वरिष्ठ पत्रकार रामानुज दत्त चौधरी ने कहा कि अरूप कुमार दत्ता ने कॉलेज के प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर केवल लेखन को ही अपनी आजीविका बनाया। असम जैसी जगह पर यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी, लेकिन वे इस क्षेत्र में भी पूरी तरह सफल रहे। उन्होंने इस मामले में एक असाधारण मिसाल कायम की है। हम उनसे और भी कई नई रचनाओं की उम्मीद करते हैं।
समारोह को संबोधित करते हुए स्वयं लेखक अरूप कुमार दत्ता ने कहा:
”आज मैं बहुत सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। अपने जन्मदिन पर इस तरह पुस्तक का विमोचन होना किसी भी लेखक के लिए अत्यंत आनंददायक क्षण होता है। साहित्य समाज का दर्पण और सभ्यता की विरासत है। असम के इतिहास, भूगोल और प्रकृति की कई बातें बाहरी दुनिया नहीं जानती थी। इन विषयों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर लाना हम साहित्यकारों का कर्तव्य है और मैं इसी कर्तव्य को निभाने का प्रयास करता आ रहा हूँ। आज विमोचित हुई “Leaves No Longer Green” इसी प्रयास का एक हिस्सा है। चाय श्रमिक, जिन्हें कभी ‘कुली’ कहकर चिढ़ाया जाता था, उन्हें ब्रिटिश शासक असम में दास बनाकर लाए थे। इस ‘कुली’ व्यापार को मान्यता देने वाले अंग्रेजों ने सभ्य जाति का मुखौटा पहन रखा था, जो कि सरासर उनका ढोंग था। इस इतिहास को जब हम खुद अच्छी तरह नहीं जानते, तो बाहरी लोग कैसे जानेंगे? चाय श्रमिकों के इसी दर्दनाक इतिहास को ‘Leaves No Longer Green’ उपन्यास में समेटने का प्रयास किया गया है।”
इसी समारोह में चिन्मयी गोस्वामी द्वारा असमिया भाषा में अनूदित अरूप कुमार दत्ता के उपन्यास “द बैग” (The Bag) का भी विमोचन किया गया। यह उपन्यास असम की उग्रवाद की समस्या और उस दौर के चुनौतीपूर्ण दिनों की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस अनूदित उपन्यास को राज्य के अग्रणी प्रकाशन संस्थान “असम बुक हाइव” ने प्रकाशित किया है।
संस्थान के मालिक धीरज गोस्वामी ने मीडिया को बताया कि अरूप कुमार दत्ता अंग्रेजी भाषा के एक सिद्धहस्त साहित्यकार हैं और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी एक विशेष पहचान है। बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उनका स्थान अद्वितीय है। उनका साहित्य बच्चों और किशोरों के मानस को छूने की विशेष क्षमता रखता है। बच्चों में विभिन्न विषयों के प्रति जिज्ञासा जगाना और रचनात्मक कल्पनाशीलता को बढ़ावा देना उनकी रचनाओं का मुख्य उद्देश्य है। ये कहानियां बच्चों को रोमांचित करने के साथ-साथ उनमें सामाजिकता की भावना भी जगाती हैं।
चूंकि मूल रचनाएं अंग्रेजी में हैं, इसलिए असमिया माध्यम के स्कूली बच्चे उनके लेखन का आनंद आसानी से नहीं ले पाते थे। इसी को ध्यान में रखते हुए “असम बुक हाइव” ने उनके बाल साहित्य का असमिया में अनुवाद कर बच्चों को उनकी रचनाओं से परिचित कराने का प्रयास किया है। पिछले वर्ष भी लेखक-पत्रकार अच्युत कुमार पटवारी, नवज्योति पाठक, चंदन भागवती और इंदिरा दत्ता द्वारा अनूदित क्रमशः “जांग्रिलार माया”, “रहस्यमय खोजन चिन्ह”, “पालोमा, अर्णव अरु युरिर दुःसाहसिक अभियान” और “प्रतिशोध” नामक बाल उपन्यास प्रकाशित किए गए थे। गोस्वामी ने बताया कि भविष्य में भी यह प्रयास जारी रहेगा।
गौरतलब है कि अरूप कुमार दत्ता के जन्मदिन पर आयोजित इस भव्य समारोह में शामिल होकर उनके प्रशंसकों और शुभचिंतकों ने उन्हें बधाई दी और उनके अच्छे स्वास्थ्य तथा सक्रिय साहित्यिक जीवन की कामना की।
कार्यक्रम की शुरुआत पंकज बरुआ के निर्देशन में पांच कलाकारों के समूह द्वारा महापुरुष शंकरदेव रचित ‘बरगीत’ और बाबी भराली बरुआ के निर्देशन में ‘मुजुरा कलाकेंद्र’ के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत ‘सत्रिया नृत्य’ के साथ हुई। कार्यक्रम का संचालन मणिकंकणा देवी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन कवि-लेखक नवज्योति पाठक ने प्रस्तुत किया।

