किडनी की सेहत का रखें हिसाब, 20 की उम्र के बाद हर छह महीने जांच क्यों जरूरी? जानिए KFT की पूरी जानकारी

किडनी हमारे शरीर के उन अंगों में शामिल है, जिनके खराब होने का पता कई बार बहुत देर से चलता है। यही वजह है कि किडनी की बीमारी को अक्सर ‘साइलेंट’ बीमारी कहा जाता है। शुरुआत में मरीज सामान्य जीवन जीता रहता है, लेकिन अंदर ही अंदर किडनी की कार्यक्षमता कम होती रहती है। जब तक पैरों में सूजन, पेशाब में बदलाव, अत्यधिक थकान, भूख कम लगना या सांस फूलने जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तब तक बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी हो सकती है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने किडनी रोगों की पहचान को लेकर महत्वपूर्ण सिफारिश की है। समिति की 177वीं रिपोर्ट में 20 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी लोगों के लिए हर छह महीने में किडनी फंक्शन टेस्ट कराने की सिफारिश की गई है। साथ ही मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य जोखिम वाले लोगों की कम से कम सालाना जांच को संस्थागत रूप देने की बात कही गई है। समिति ने यह भी कहा है कि सार्वजनिक और निजी प्रयोगशालाओं में जब भी सीरम क्रिएटिनिन की जांच हो, तो उसके साथ अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट यानी ईजीएफआर की गणना भी अपने आप की जाए। 

भारत में बढ़ते किडनी रोग के बोझ को देखते हुए यह सिफारिश महत्वपूर्ण है। 2023 के वैश्विक अध्ययन के मुताबिक भारत में करीब 13.8 करोड़ लोग क्रॉनिक किडनी डिजीज से प्रभावित थे और मामलों की संख्या के लिहाज से भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर था। अध्ययन में यह भी सामने आया कि क्रॉनिक किडनी डिजीज 2023 में दुनिया में मौत का नौवां प्रमुख कारण थी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर KFT में ऐसा क्या देखा जाता है, जिससे किडनी की बीमारी का पता शुरुआती दौर में लगाया जा सके? विशेषज्ञों के मुताबिक केवल खून में क्रिएटिनिन देखकर किडनी की पूरी स्थिति समझ लेना पर्याप्त नहीं है। किडनी की कार्यक्षमता का बेहतर आकलन करने के लिए क्रिएटिनिन से निकाली गई ईजीएफआर और पेशाब में एल्ब्यूमिन की मात्रा भी महत्वपूर्ण होती है। 

राष्ट्रीय किडनी फाउंडेशन के अनुसार किडनी की बीमारी की पहचान में सीरम क्रिएटिनिन से ईजीएफआर और पेशाब में एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन अनुपात यानी यूएसीआर दो प्रमुख जांच हैं। एम्स नई दिल्ली के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संदीप महाजन जैसे विशेषज्ञों की विशेषज्ञता का केंद्र ही किडनी रोग, उसकी जटिलताओं और शुरुआती पहचान से जुड़ा क्षेत्र है। दिल्ली नेफ्रोलॉजी सोसायटी की 2026-27 कार्यकारिणी में भी उन्हें अध्यक्ष और एम्स नई दिल्ली में नेफ्रोलॉजी विभाग का प्रोफेसर बताया गया है।

KFT में कौन-कौन सी जांच होती हैं और किसे कितनी बार करानी चाहिए?

KFT यानी किडनी फंक्शन टेस्ट वास्तव में एक अकेली जांच का नाम नहीं है। इसमें डॉक्टर मरीज की स्थिति और जोखिम के आधार पर कई रक्त और पेशाब की जांचों को शामिल कर सकते हैं। सबसे आम जांचों में सीरम क्रिएटिनिन शामिल है। क्रिएटिनिन शरीर में बनने वाला अपशिष्ट पदार्थ है, जिसे स्वस्थ किडनी खून से छानकर पेशाब के रास्ते बाहर निकालती है। जब किडनी की छानने की क्षमता घटती है तो क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ सकता है।

इसके बाद आता है ईजीएफआर, यानी अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट। यह बताता है कि किडनी खून को कितनी प्रभावी ढंग से छान रही है। ईजीएफआर जितना कम होता है, किडनी की कार्यक्षमता में कमी की संभावना उतनी अधिक होती है। हालांकि किसी एक रिपोर्ट को देखकर किडनी की बीमारी का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जाता। लगातार असामान्य परिणाम और चिकित्सकीय संदर्भ दोनों महत्वपूर्ण होते हैं।

तीसरी महत्वपूर्ण जांच पेशाब में एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन अनुपात यानी यूएसीआर है। पेशाब में एल्ब्यूमिन यानी प्रोटीन का लगातार बढ़ा हुआ आना किडनी को नुकसान का शुरुआती संकेत हो सकता है। खास बात यह है कि किसी व्यक्ति का क्रिएटिनिन सामान्य दिख सकता है, लेकिन पेशाब में एल्ब्यूमिन बढ़ा हुआ मिल सकता है। इसलिए केवल क्रिएटिनिन की जांच पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं माना जाता। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर यूरिन रूटीन, इलेक्ट्रोलाइट्स, यूरिया, रक्त शर्करा, हीमोग्लोबिन, लिपिड प्रोफाइल या किडनी की अल्ट्रासाउंड जैसी जांच भी करा सकते हैं। कौन-सी जांच कब जरूरी है, यह व्यक्ति की उम्र, बीमारी, दवाओं और पिछली रिपोर्ट पर निर्भर करता है।

किसे कितनी बार जांच करानी चाहिए? संसदीय समिति ने 20 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी लोगों के लिए छह महीने में KFT की सिफारिश की है। वहीं जोखिम वाले लोगों के लिए सालाना सीकेडी जांच की बात कही गई है। इनमें मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले लोग प्रमुख हैं। 60 वर्ष से अधिक उम्र, परिवार में किडनी रोग का इतिहास, मोटापा, तंबाकू का सेवन, पहले किडनी की अचानक खराबी, बार-बार पेशाब का संक्रमण या पथरी और लंबे समय तक ऐसी दर्द निवारक दवाओं का सेवन करने वाले लोग भी अधिक जोखिम में माने गए हैं। हालांकि सामान्य व्यक्ति के लिए जांच की वास्तविक आवृत्ति डॉक्टर व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर तय कर सकते हैं। राष्ट्रीय किडनी फाउंडेशन की मौजूदा चिकित्सकीय सामग्री विशेष रूप से मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे जोखिम वाले लोगों में कम से कम सालाना ईजीएफआर और यूएसीआर जांच पर जोर देती है।

किडनी को बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर नियंत्रण में रहें। भोजन में अतिरिक्त नमक कम करें, वजन नियंत्रित रखें, नियमित शारीरिक गतिविधि करें, धूम्रपान से बचें और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें। बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द की दवाएं लंबे समय तक न लें, खासकर एनएसएआईडी श्रेणी की दवाओं का अनावश्यक इस्तेमाल किडनी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

पानी भी शरीर की जरूरत के अनुसार पर्याप्त मात्रा में पीना चाहिए, लेकिन यह मान लेना गलत है कि जितना ज्यादा पानी पिएंगे, किडनी उतनी ही स्वस्थ रहेगी। किडनी या हृदय की बीमारी वाले लोगों में पानी की मात्रा डॉक्टर तय कर सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि रिपोर्ट में हल्का बदलाव आने पर घबराने के बजाय डॉक्टर से सलाह लें। यदि ईजीएफआर लगातार कम है, पेशाब में प्रोटीन या एल्ब्यूमिन लगातार बढ़ा हुआ है, रक्तचाप नियंत्रित नहीं हो रहा है या किडनी की कार्यक्षमता तेजी से घट रही है तो नेफ्रोलॉजिस्ट से परामर्श जरूरी हो सकता है। गंभीर स्थितियों में नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञ की सलाह बीमारी को आगे बढ़ने से रोकने और उचित उपचार तय करने में महत्वपूर्ण होती है।

किडनी की बीमारी में सबसे बड़ा बचाव यही है कि लक्षणों का इंतजार न किया जाए। नियमित रक्तचाप और शुगर की निगरानी, समय पर रक्त और पेशाब की जांच, संतुलित खानपान और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाओं का इस्तेमाल किडनी की सेहत को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद कर सकता है। संसदीय समिति की नई सिफारिश का मूल संदेश भी यही है किडनी खराब होने के बाद इलाज करने से बेहतर है कि बीमारी का पता समय रहते लगाया जाए और उसके बढ़ने की रफ्तार को रोका जाए।

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