पश्चिम एशिया में तनाव के बीच पीएम मोदी और ईरान के राष्ट्रपति पेजेशकियन की मुलाकात, कई मुद्दों पर मंथन

पश्चिम एशिया में जारी तनाव और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की सोमवार को अहम मुलाकात हुई। दोनों नेताओं की यह मुलाकात किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के दौरान हुई। मोदी और पेजेशकियन की आमने-सामने हुई इस मुलाकात को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर लगातार चिंता जताई जा रही है। शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होनी है। ऐसे में मोदी और पेजेशकियन की मुलाकात पर सभी की नजरें टिकी रहीं। हालांकि, दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत में किन-किन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई, इसकी पूरी जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है। इसके बावजूद, मौजूदा क्षेत्रीय परिस्थितियों को देखते हुए दोनों देशों के बीच यह संवाद काफी अहम माना जा रहा है।

भारत और ईरान के संबंध लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और क्षेत्रीय संपर्क जैसे कई मुद्दों पर सहयोग होता रहा है। पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े घटनाक्रम का भारत के हितों पर सीधा या अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। खासकर ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्र में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण विषय हैं। प्रधानमंत्री मोदी लगातार यह कहते रहे हैं कि क्षेत्र में पैदा होने वाले विवादों और तनाव का समाधान बातचीत तथा कूटनीति के जरिए किया जाना चाहिए। भारत का रुख यह रहा है कि किसी भी संघर्ष को बढ़ाने के बजाय सभी पक्षों को संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। ईरान के साथ बातचीत में भी भारत ने इसी संतुलित दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी है।

पीएम मोदी और पेजेशकियन के बीच इससे पहले मार्च में फोन पर बातचीत हुई थी। उस दौरान ईरानी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी को ईरान के हालात और पश्चिम एशिया में चल रहे घटनाक्रम की जानकारी दी थी। बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि सभी संबंधित मुद्दों का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से किया जाना चाहिए। मार्च की बातचीत में प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान और पूरे क्षेत्र में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई थी। भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों में काम और कारोबार के सिलसिले में रहते हैं। क्षेत्र में तनाव बढ़ने की स्थिति में उनकी सुरक्षा के साथ-साथ उनकी सुरक्षित आवाजाही भी भारत की प्राथमिकताओं में शामिल रहती है। इसके अलावा भारत ने ऊर्जा आपूर्ति और सामान की आवाजाही को बिना किसी रुकावट के जारी रखने के महत्व पर भी जोर दिया था। पश्चिम एशिया भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में किसी भी बड़े संघर्ष या परिवहन मार्ग में बाधा का असर वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था के साथ भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

युद्ध नहीं चाहता ईरान, हमले की स्थिति में जवाब देने की चेतावनी

बिश्केक में एससीओ सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए रवाना होने से पहले ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने क्षेत्रीय तनाव और युद्ध को लेकर ईरान का रुख स्पष्ट किया था। उन्होंने कहा था कि ईरान युद्ध नहीं चाहता। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर ईरान के खिलाफ कोई हमला होता है तो उसका मजबूती से जवाब दिया जाएगा। पेजेशकियन ने क्षेत्र में अस्थिरता को किसी भी देश के हित में नहीं बताया। उनका कहना था कि क्षेत्रीय देशों के बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी है, ताकि आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पश्चिम एशिया के देशों का इतिहास और सभ्यता हजारों साल पुरानी है और इन देशों के बीच लंबे समय से संपर्क और सहयोग की परंपरा रही है। ईरानी राष्ट्रपति ने एससीओ शिखर सम्मेलन को भी महत्वपूर्ण मंच बताया। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, उन्होंने कहा कि सम्मेलन में क्षेत्र के अधिकांश नेता मौजूद रहेंगे और यह दुनिया में अलग-अलग तथा स्वतंत्र आवाजों की मौजूदगी का प्रतीक है। उन्होंने क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

भारत और ईरान दोनों ही क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर अपने-अपने स्तर पर लगातार संपर्क में रहे हैं। भारत की कोशिश रही है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच उसके सभी प्रमुख साझेदारों के साथ संवाद बना रहे। यही वजह है कि मोदी और पेजेशकियन की मुलाकात को केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। इसके व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ भी हैं। भारत के लिए ईरान की अहमियत का एक बड़ा कारण दोनों देशों के बीच संपर्क और परिवहन से जुड़ी संभावनाएं भी हैं। ईरान भारत को मध्य एशिया और उससे आगे के क्षेत्रों तक पहुंच बनाने के लिए महत्वपूर्ण मार्ग उपलब्ध कराता है। ऐसे में क्षेत्र में शांति और स्थिरता भारत की आर्थिक तथा रणनीतिक प्राथमिकताओं से भी जुड़ी हुई है।

बिश्केक में मोदी की मौजूदगी के दौरान दूसरे देशों के नेताओं के साथ भी उनकी अलग-अलग मुलाकातें प्रस्तावित हैं। इनमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ संभावित मुलाकात को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत रणनीतिक संबंध हैं और दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच होने वाली बैठकों में द्विपक्षीय सहयोग के साथ वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी चर्चा होती रही है। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी, किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव के निमंत्रण पर छठे विश्व घुमंतू खेलों के उद्घाटन समारोह में भी शामिल हो सकते हैं। इससे भारत और किर्गिस्तान के बीच संबंधों को और मजबूत करने का अवसर भी मिल सकता है।

कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया में तनाव के बीच मोदी और पेजेशकियन की बिश्केक में हुई मुलाकात ने क्षेत्रीय घटनाक्रम के बीच भारत की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका को सामने रखा है। भारत जहां एक ओर अपने नागरिकों की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर सतर्क है, वहीं दूसरी ओर वह क्षेत्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति पर जोर देता रहा है। ऐसे में दोनों नेताओं की यह मुलाकात आने वाले दिनों में भारत-ईरान संबंधों और पश्चिम एशिया से जुड़े घटनाक्रमों के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है। 

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