बैंकों में नकदी का संकट गहराया, ग्राहकों पर बढ़ सकता है असर, राहत के लिए आरबीआई ने उठाया बड़ा कदम

अगर आपको आने वाले दिनों में बैंकिंग लेनदेन, बड़े कॉरपोरेट लोन या अल्पकालिक वित्तीय बाजार में ब्याज दरों में हलचल देखने को मिले तो इसकी वजह बैंकिंग व्यवस्था में अचानक आई नकदी की कमी हो सकती है। करीब तीन महीने तक अधिशेष (सरप्लस) की स्थिति में रहने के बाद भारतीय बैंकिंग प्रणाली एक बार फिर नकदी घाटे में पहुंच गई है। इसका सीधा असर आम ग्राहकों की दैनिक बैंकिंग सेवाओं पर भले ही तत्काल न दिखे, लेकिन वित्तीय बाजार, अल्पकालिक ब्याज दरों और बैंकों की फंडिंग लागत पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। 

यही कारण है कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने तुरंत कदम उठाते हुए 1.41 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग प्रणाली में डालने का फैसला किया है। भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक सोमवार को बैंकिंग व्यवस्था की शुद्ध नकदी स्थिति 19,971 करोड़ रुपये के घाटे में पहुंच गई। 22 मार्च के बाद यह पहला मौका है जब बैंकिंग सिस्टम में नकदी अधिशेष खत्म होकर घाटे की स्थिति बनी है। इससे पहले पिछले तीन महीनों तक बैंकों के पास पर्याप्त नकदी उपलब्ध थी, जिससे वित्तीय प्रणाली में संतुलन बना हुआ था। नकदी की इस कमी का असर मंगलवार को मनी मार्केट में भी देखने को मिला। 

मौद्रिक नीति के परिचालन लक्ष्य माने जाने वाली भारित औसत कॉल दर (डब्ल्यूएसीआर) बढ़कर 5.38 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि सोमवार को यह 5.33 प्रतिशत थी। यह संकेत देता है कि बैंकों के लिए अल्पकालिक फंड जुटाना पहले की तुलना में थोड़ा महंगा हो गया है। स्थिति को सामान्य बनाने के लिए आरबीआई ने सात दिन की वैरिएबल रेट रीपो (वीआरआर) नीलामी के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली में 1.41 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी उपलब्ध कराई। 

इस व्यवस्था के तहत बैंक सरकारी प्रतिभूतियों को गिरवी रखकर बाजार आधारित दरों पर आरबीआई से अल्पकालिक धन उधार ले सकते हैं। इससे वित्तीय प्रणाली में नकदी का प्रवाह बना रहता है और ब्याज दरों पर अनावश्यक दबाव कम होता है। यह कदम बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि नकदी की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर बैंकों की उधारी लागत और आगे चलकर ग्राहकों के लिए उपलब्ध वित्तीय सेवाओं पर भी पड़ सकता है।

अग्रिम कर भुगतान और नकद निकासी बनी नकदी संकट की बड़ी वजह

इस नकदी संकट की सबसे बड़ी वजह तिमाही के अंत में कंपनियों और संस्थानों द्वारा किए गए अग्रिम कर भुगतान हैं। जब बड़ी मात्रा में कर सरकार के खाते में जमा होता है तो उतनी राशि अस्थायी रूप से बैंकिंग प्रणाली से बाहर चली जाती है, जिससे बैंकों के पास उपलब्ध नकदी कम हो जाती है। इसके अलावा हाल के दिनों में लोगों द्वारा नकद निकासी में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में इस बार बैंकों से अधिक नकदी निकाली गई, जिससे बैंकिंग व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बना। नकद की बढ़ती मांग ने पहले से मौजूद नकदी कमी को गहरा कर दिया। 

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता के अनुसार बैंकिंग व्यवस्था में नकदी की कमी मुख्य रूप से अग्रिम कर भुगतान और बढ़ी हुई मुद्रा निकासी का परिणाम है। उनका मानना है कि जैसे-जैसे महीने के अंत में सरकार अपने खर्च बढ़ाएगी और विभिन्न योजनाओं के तहत धन बाजार में वापस आएगा, बैंकिंग प्रणाली फिर से अधिशेष नकदी की स्थिति में लौट सकती है। फिलहाल आम बचत खाताधारकों या नियमित बैंक ग्राहकों को घबराने की आवश्यकता नहीं है। 

एटीएम, ऑनलाइन बैंकिंग, यूपीआई और सामान्य बैंकिंग सेवाओं पर तत्काल किसी बड़े व्यवधान की संभावना नहीं है। हालांकि यदि ऐसी स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो अल्पकालिक ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है और बैंकों की फंडिंग लागत में भी वृद्धि हो सकती है। फिलहाल आरबीआई के त्वरित हस्तक्षेप से बाजार को राहत मिली है और माना जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में सरकारी खर्च बढ़ने के साथ बैंकिंग प्रणाली में नकदी का प्रवाह फिर सामान्य हो जाएगा। वित्तीय बाजार की नजर अब इस बात पर रहेगी कि नकदी अधिशेष कितनी जल्दी लौटता है और ब्याज दरों पर इसका आगे क्या असर पड़ता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shopping Cart