भ्रष्टाचार पर जवाबदेही जरूरी

सरकारी विभागों और संस्थानों के खिलाफ वर्ष 2025 में भ्रष्टाचार की 70 हजार से अधिक शिकायतें मिलना महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के सामने खड़ी गंभीर चुनौती का संकेत है। केंद्रीय सतर्कता आयोग की सालाना रिपोर्ट में सामने आए 70,584 शिकायतों के आंकड़े से यह स्पष्ट होता है कि आम नागरिकों और सरकारी व्यवस्था से जुड़े लोगों के बीच भ्रष्टाचार को लेकर असंतोष अब भी व्यापक है। हालांकि 64,905 शिकायतों का निपटारा किया जाना यह बताता है कि शिकायतों पर कार्रवाई की व्यवस्था सक्रिय है, लेकिन वर्ष के अंत तक 5,679 शिकायतों का लंबित रहना और इनमें से 2,002 मामलों का तीन महीने से अधिक समय से अटका होना व्यवस्था की गति और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भ्रष्टाचार की शिकायत केवल संख्या नहीं होती। उसके पीछे किसी नागरिक का अनुभव, किसी कर्मचारी की शिकायत, किसी कारोबारी की परेशानी या किसी सरकारी सेवा में बाधा की कहानी होती है। इसलिए प्रत्येक शिकायत का समयबद्ध और निष्पक्ष निपटारा प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि भ्रष्टाचार की सबसे अधिक शिकायतें बैंकों और रेलवे जैसे आम लोगों से सीधे जुड़े क्षेत्रों से आईं। बैंकों के खिलाफ 9,933 शिकायतें और रेलवे से जुड़ी 9,381 शिकायतें दर्ज होना इस बात का संकेत है कि जिन संस्थानों से करोड़ों नागरिक प्रतिदिन संपर्क करते हैं, वहां पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करने की जरूरत है। बैंकिंग व्यवस्था में तकनीक के विस्तार के बावजूद यदि इतनी बड़ी संख्या में भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आ रही हैं तो केवल डिजिटल व्यवस्था को भ्रष्टाचार खत्म करने का समाधान मानना पर्याप्त नहीं है। जहां मानवीय निर्णय की गुंजाइश है, वहां जवाबदेही की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। इसी तरह रेलवे जैसी विशाल सार्वजनिक सेवा में टिकट, ठेके, खरीद, निर्माण, भर्ती और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।आवास और शहरी मामलों से संबंधित 6,531 शिकायतें भी महत्वपूर्ण हैं। जमीन, निर्माण, नक्शे की मंजूरी, शहरी परियोजनाएं, ठेके और स्थानीय निकायों से जुड़ी सेवाएं आम नागरिक के दैनिक जीवन से सीधे जुड़ी होती हैं। ऐसे क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का असर केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहता। इससे शहरों का नियोजित विकास प्रभावित होता है, अवैध निर्माण बढ़ता है और नागरिकों का संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है। स्थानीय निकायों के खिलाफ 4,834 शिकायतें मिलना भी इसी संदर्भ में गंभीरता से देखा जाना चाहिए। नगर निकाय नागरिक और सरकार के बीच सबसे नजदीकी कड़ी होते हैं। यदि इसी स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतें लगातार आती हैं तो सुशासन का दावा अधूरा रह जाता है।कोयला क्षेत्र में 4,118, वित्त क्षेत्र में 3,107, दिल्ली सरकार से संबंधित 2,804 और पेट्रोलियम मंत्रालय से जुड़ी 2,722 शिकायतें भी बताती हैं कि समस्या किसी एक विभाग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। दिल्ली पुलिस के खिलाफ 2,633 शिकायतें और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग क्षेत्र से जुड़ी 2,139 शिकायतें भी चिंता का विषय हैं। रक्षा, दूरसंचार, बीमा, डाक और श्रम जैसे क्षेत्रों में भी शिकायतों की संख्या कम नहीं है। इसका अर्थ है कि भ्रष्टाचार से मुकाबला करने के लिए अलग-अलग विभागों में अलग-अलग उपाय करने के साथ एक व्यापक संस्थागत सुधार की भी आवश्यकता है।यहां एक और सवाल उठता है कि शिकायतों के निपटारे को सफलता का अकेला पैमाना माना जाए या नहीं। 64,905 शिकायतों का निपटारा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन निपटारे का अर्थ केवल शिकायत बंद कर देना नहीं होना चाहिए। वास्तविक सफलता तब होगी जब शिकायत की निष्पक्ष जांच हो, दोषी पाए जाने पर कार्रवाई हो, व्यवस्था में मौजूद कमी दूर की जाए और भविष्य में उसी प्रकार की शिकायत की संभावना कम हो। यदि किसी मामले की जांच के बाद केवल फाइल बंद कर दी जाती है, तो आंकड़े भले ही बेहतर दिखाई दें, लेकिन भ्रष्टाचार पर वास्तविक अंकुश नहीं लगता। इसलिए शिकायतों के निपटारे की गुणवत्ता और उसके परिणाम की निगरानी भी जरूरी है।तीन महीने से अधिक समय से लंबित 2,002 शिकायतें इस व्यवस्था में सुधार की तत्काल जरूरत को रेखांकित करती हैं। मुख्य सतर्कता अधिकारियों से शिकायतों की जांच तीन महीने के भीतर पूरी करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में निर्धारित समयसीमा के बावजूद हजारों शिकायतों का लंबित रहना प्रशासनिक सुस्ती का संकेत है। यह भी देखना होगा कि देरी के कारण क्या हैं। क्या विभागों के पास पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं? क्या जांच प्रक्रिया बहुत जटिल है? क्या संबंधित अधिकारियों से समय पर जानकारी नहीं मिलती? या फिर प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में कार्रवाई धीमी पड़ जाती है? इन सवालों का जवाब व्यवस्था के भीतर ही तलाशना होगा।भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए केवल निगरानी संस्थाओं को मजबूत करना पर्याप्त नहीं है। सरकारी प्रक्रियाओं को भी ऐसा बनाया जाना चाहिए कि भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम से कम हो। सेवाओं का अधिक से अधिक डिजिटलीकरण, निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता, निविदाओं और ठेकों की निगरानी, अधिकारियों की जवाबदेही तथा शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, जिन विभागों में बार-बार एक जैसी शिकायतें सामने आती हैं, वहां केवल व्यक्तिगत कार्रवाई के बजाय पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की जानी चाहिए। क्योंकि यदि किसी विभाग में एक ही तरह की शिकायत बार-बार आती है तो समस्या केवल किसी एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमजोरी की भी हो सकती है।भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शिकायतकर्ता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है। यदि कोई नागरिक शिकायत करता है और उसे लगता है कि उसकी शिकायत लंबे समय तक लंबित रहेगी या शिकायत करने के बाद उसे ही परेशानी उठानी पड़ेगी, तो वह आगे आने से बचेगा। इसलिए शिकायतों की प्रक्रिया सरल, सुरक्षित और पारदर्शी होनी चाहिए। शिकायतकर्ता को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उसकी शिकायत किस स्तर पर है और उसका निपटारा कब तक होगा। साथ ही झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ उचित व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि निगरानी तंत्र का दुरुपयोग न हो।सरकार ने पिछले वर्षों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए तकनीक, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ऑनलाइन सेवाओं और डिजिटल भुगतान जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया है। इनसे निश्चित रूप से भ्रष्टाचार के कई पारंपरिक रास्ते बंद हुए हैं। लेकिन भ्रष्टाचार का स्वरूप भी बदलता रहता है। इसलिए नई तकनीक के साथ नई निगरानी व्यवस्था भी विकसित करनी होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आंकड़ा विश्लेषण जैसे आधुनिक साधनों का इस्तेमाल संदिग्ध लेनदेन, असामान्य निर्णय और बार-बार होने वाली शिकायतों की पहचान में किया जा सकता है। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके पीछे ईमानदार प्रशासनिक इच्छाशक्ति और स्वतंत्र निगरानी मौजूद हो।अंततः CVC की रिपोर्ट को केवल विभागवार शिकायतों की सूची के रूप में देखने के बजाय इसे प्रशासन के लिए आत्ममंथन का अवसर माना जाना चाहिए। 70 हजार से अधिक शिकायतें यह बताती हैं कि नागरिक व्यवस्था से बेहतर शासन की अपेक्षा रखते हैं। शिकायतों का बड़ा हिस्सा यदि बैंकों, रेलवे, शहरी निकायों और पुलिस जैसे प्रत्यक्ष जनसेवा वाले संस्थानों से आ रहा है तो इन क्षेत्रों में सुधार को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि शिकायत दर्ज होने से लेकर जांच और कार्रवाई तक पूरी प्रक्रिया समयबद्ध, निष्पक्ष और पारदर्शी हो। भ्रष्टाचार केवल सरकारी धन की चोरी नहीं है; यह नागरिक के विश्वास की चोरी भी है। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार केवल सजा नहीं, बल्कि ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था बनाना है जिसमें गलत काम करने की गुंजाइश कम हो और गलत काम होने पर कार्रवाई निश्चित हो। जब शिकायतों की संख्या घटने लगेगी, जांच में देरी खत्म होगी और नागरिकों को बिना किसी अनुचित दबाव या भुगतान के सरकारी सेवाएं मिलने लगेंगी, तभी सुशासन का दावा वास्तविक अर्थों में सार्थक माना जाएगा।

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