सात महीने पहले तक डॉलर के मुकाबले करीब 90 के स्तर पर कारोबार कर रहा भारतीय रुपया अब लगातार दबाव में है। वर्ष 2026 में रुपये की कमजोरी थमने का नाम नहीं ले रही। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 48 पैसे की बड़ी गिरावट के साथ 96.16 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। इससे एक दिन पहले सोमवार को भी इसमें 30 पैसे की कमजोरी दर्ज की गई थी। इस तरह महज सात महीनों में रुपये की कीमत में लगभग सात प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और घरेलू आर्थिक चुनौतियों ने मिलकर भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है। फिलहाल रुपये के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब दो प्रतिशत बढ़कर 84.98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में तेजी से बिगड़ते हालात हैं। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है।
ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य को अगली सूचना तक बंद रखने की बात कही है, जबकि अमेरिका ने ईरानी जहाजों की नाकेबंदी और इस मार्ग से गुजरने वाले अन्य जहाजों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा की है। इसके अलावा कुवैत के एक ऑफशोर तेल प्लेटफॉर्म पर हुए हमले ने भी वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। कोटक सिक्योरिटीज के हेड ऑफ कमोडिटी एंड करेंसी रिसर्च अनिंद्य बनर्जी के अनुसार, कच्चे तेल में आई तेजी का सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ रहा है। भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है और इसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। जब तेल महंगा होता है तो आयातकों को अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव बनता है। यही कारण है कि तेल की कीमतों में तेजी के साथ भारतीय मुद्रा लगातार कमजोर होती जा रही है। हालांकि रुपये की कमजोरी केवल तेल तक सीमित नहीं है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े संकेत भी डॉलर को लगातार मजबूती दे रहे हैं। बाजार में यह धारणा बन रही है कि अगले बारह महीनों के दौरान अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में दो बार बढ़ोतरी कर सकता है। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों की संभावना निवेशकों को डॉलर आधारित परिसंपत्तियों की ओर आकर्षित करती है।
इससे डॉलर मजबूत होता है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है। भारतीय रुपया भी इसी वैश्विक प्रवृत्ति का असर झेल रहा है। जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ती है तो अंतरराष्ट्रीय निवेशक अधिक सुरक्षित और बेहतर रिटर्न वाले अमेरिकी बाजार की ओर रुख करते हैं। इसका असर विदेशी निवेश पर पड़ता है और भारत जैसे देशों से पूंजी का कुछ हिस्सा बाहर निकलने लगता है। इससे भी रुपये की विनिमय दर कमजोर होती है। घरेलू मोर्चे पर भी स्थिति पूरी तरह अनुकूल नहीं है। जून महीने में खुदरा महंगाई अनुमान से अधिक रही है। साथ ही व्यापार घाटा बढ़ने और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी भारतीय मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डाला है। जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से पैसा निकालते हैं तो उन्हें डॉलर की जरूरत होती है। इससे भी डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये की कीमत कमजोर होती जाती है।
अमेरिकी आंकड़ों और पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर नजर, 97 तक जा सकता है रुपया
इस सप्ताह दो बड़े घटनाक्रम रुपये की दिशा तय कर सकते हैं। पहला अमेरिका के महंगाई के ताजा आंकड़े और दूसरा अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अधिकारियों के बयान। यदि अमेरिकी महंगाई अपेक्षा से अधिक रहती है तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रख सकता है या उनमें और बढ़ोतरी के संकेत दे सकता है। ऐसी स्थिति में डॉलर और मजबूत होगा, जिसका सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ेगा। दूसरी ओर यदि अमेरिकी महंगाई में नरमी देखने को मिलती है या फेडरल रिजर्व अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाता है तो डॉलर की मजबूती कुछ कम हो सकती है। इससे रुपये को भी राहत मिलने की संभावना बनेगी। हालांकि फिलहाल वैश्विक परिस्थितियां ऐसी हैं कि निवेशक जोखिम वाले बाजारों की बजाय सुरक्षित निवेश विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक अगले कुछ दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपया 95.70 से 96.50 के दायरे में कारोबार कर सकता है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है, तेल की कीमतों में और उछाल आता है या अमेरिका से उम्मीद से अधिक सख्त आर्थिक संकेत मिलते हैं तथा रुपया 96.50 के ऊपर टिक जाता है, तो भारतीय मुद्रा 97 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक भी पहुंच सकती है। हालांकि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक आवश्यकता पड़ने पर सरकारी बैंकों के माध्यम से विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।
इसके अलावा विदेशी मुद्रा गैर-निवासी बैंक जमा (एफसीएनआर-बी) और बाहरी वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) जैसे माध्यमों से विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ने की संभावना भी बनी हुई है। इससे रुपये में अत्यधिक और अनियंत्रित गिरावट की आशंका फिलहाल सीमित मानी जा रही है। फिलहाल भारतीय मुद्रा की दिशा काफी हद तक वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी आर्थिक संकेतकों और विदेशी निवेशकों के रुख पर निर्भर करेगी। यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव कम होता है और ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौटती है तो रुपये को राहत मिल सकती है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में निकट भविष्य तक दबाव बने रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

