दुनिया इस समय एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ी है जहां युद्ध, तेल संकट, महंगाई और वैश्विक अनिश्चितता ने बड़े-बड़े देशों की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया है। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव ने केवल राजनीतिक हालात ही नहीं बिगाड़े, बल्कि इसका असर सीधे वैश्विक बाजारों, तेल की कीमतों और निवेश के माहौल पर भी दिखाई देने लगा है। इसी बीच संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट ने भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर भी बड़ा संकेत दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने साफ कहा है कि भारत की आर्थिक रफ्तार मजबूत जरूर बनी हुई है, लेकिन दुनिया में चल रहे संकटों का असर अब भारत पर भी दिखने लगा है। पहले जहां भारत की विकास दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था, वहीं अब इसे घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया गया है। हालांकि राहत की बात यह है कि इतनी चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ती महंगाई, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता ने कई देशों के लिए आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है।
भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक विदेशों पर निर्भर है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर महंगाई, परिवहन, उद्योग और आम आदमी की जेब पर पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग यानी यूएन डीईएसए की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया संकट ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका दिया है। इससे वैश्विक वृद्धि धीमी हुई है और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है। रिपोर्ट में यह भी माना गया कि भारत अभी भी मजबूत घरेलू मांग और सरकारी निवेश के कारण अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती के संकेत अब भी मौजूद हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में लगातार हो रहे निवेश ने भारत को कई देशों के मुकाबले मजबूत स्थिति में बनाए रखा है। लेकिन वैश्विक हालात की वजह से निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है और वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
यूएन डीईएसए के वरिष्ठ अर्थशास्त्री इंगो पिटरले ने कहा कि भारत वैश्विक संकट से पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। उन्होंने माना कि भारत ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर है और रेमिटेंस जैसे माध्यमों से भी प्रभावित हो सकता है। अगर पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर भारत के विदेशी मुद्रा प्रवाह और आर्थिक संतुलन पर भी दिखाई दे सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है। इससे ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर असर पड़ेगा। यानी महंगाई फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा सकती है। भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब देश खुद को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा रहा है। सरकार लगातार निवेश, उत्पादन और रोजगार बढ़ाने की कोशिशों में लगी हुई है। लेकिन वैश्विक हालात ने अब भारत के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
दुनिया में संकट गहराया, भारत पर भी दिखने लगा असर
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया के कई बड़े देशों की आर्थिक वृद्धि पहले से कमजोर पड़ रही है। यूरोप और अमेरिका जैसे बाजारों में भी आर्थिक गतिविधियों की गति धीमी हुई है। इसका असर वैश्विक व्यापार पर पड़ रहा है। भारत का निर्यात भी इससे प्रभावित हो सकता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मांग कम होने से व्यापारिक गतिविधियां धीमी पड़ सकती हैं। हालांकि भारत के लिए सकारात्मक बात यह है कि देश की घरेलू खपत अभी भी मजबूत बनी हुई है। ग्रामीण और शहरी बाजारों में मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सरकारी स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण परियोजनाओं पर खर्च लगातार बढ़ाया जा रहा है। इससे रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिल रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा सहारा उसका विशाल घरेलू बाजार देता है।
दुनिया के कई देशों की तुलना में भारत में उपभोक्ताओं की संख्या बहुत ज्यादा है, जिससे बाजार में गतिविधियां बनी रहती हैं। यही वजह है कि वैश्विक संकट के बावजूद भारत की विकास दर अब भी मजबूत मानी जा रही है। दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत के लिए केवल तेल संकट तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं और वहां से आने वाला रेमिटेंस भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। अगर क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है तो रोजगार और धन प्रेषण दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
यूएन रिपोर्ट में वैश्विक वित्तीय सख्ती का भी जिक्र किया गया है। दुनिया के कई केंद्रीय बैंक महंगाई नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें ऊंची बनाए हुए हैं। इससे निवेश महंगा हो जाता है और उद्योगों पर दबाव बढ़ता है। भारत के लिए भी यह चुनौती बन सकती है क्योंकि विदेशी निवेश प्रभावित होने की आशंका रहती है।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में भारत सरकार को संतुलित आर्थिक रणनीति अपनानी होगी। एक तरफ महंगाई नियंत्रित रखना जरूरी होगा तो दूसरी तरफ विकास की रफ्तार भी बनाए रखनी होगी। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति भी इसी संतुलन पर निर्भर करेगी। इसके अलावा मानसून की स्थिति भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अहम रहने वाली है। अगर बारिश सामान्य रहती है तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और खाद्य महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन वैश्विक हालात खराब होने पर बाहरी दबाव फिर भी बने रहेंगे। फिलहाल संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भारत के लिए चेतावनी भी है और उम्मीद भी। चेतावनी इसलिए क्योंकि दुनिया में बढ़ते संकट का असर भारत पर भी पड़ सकता है। उम्मीद इसलिए क्योंकि इतनी चुनौतियों के बावजूद भारत अब भी दुनिया की सबसे मजबूत और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। आने वाले समय में सरकार की नीतियां, वैश्विक हालात और घरेलू मांग तय करेगी कि भारत अपनी विकास रफ्तार को कितनी मजबूती से बनाए रख पाता है।

