हरियाणा में बिजली कर्मचारियों की हड़ताल से हाहाकार, कई शहरों में ब्लैकआउट, पानी की सप्लाई ठप, उद्योगों पर भी संकट

हरियाणा में बिजली व्यवस्था को लेकर जारी विवाद अब आम लोगों की परेशानी का बड़ा कारण बन गया है। बिजली निगमों के करीब 40 हजार कर्मचारियों और इंजीनियरों की हड़ताल के बीच प्रदेश के कई शहरों और ग्रामीण इलाकों में बिजली संकट गहरा गया है। कई जगहों पर बिजली आपूर्ति बाधित होने से लोगों को अंधेरे में रात गुजारनी पड़ रही है। घरों में इनवर्टर जवाब देने लगे हैं, पेयजल आपूर्ति प्रभावित हो रही है और औद्योगिक इकाइयों में कामकाज पर भी असर पड़ रहा है। बिजली की किल्लत से परेशान लोग कई स्थानों पर विरोध जताने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। बिजली कर्मचारियों की यह हड़ताल 22 अक्टूबर से शुरू हुई है और 24 अक्टूबर 2026 तक जारी रखने का ऐलान किया गया है। कर्मचारियों और इंजीनियरों का विरोध बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनी को प्रवेश देने के फैसले को लेकर है। उनका कहना है कि गुरुग्राम और नूंह में बिजली वितरण के लिए 25 साल का समांतर लाइसेंस निजी कंपनी को दिया जाना सार्वजनिक बिजली व्यवस्था और कर्मचारियों के हितों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इसी फैसले के विरोध में बिजली निगमों से जुड़े कर्मचारी एकजुट होकर हड़ताल पर हैं।

हड़ताल के कारण प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में बिजली आपूर्ति को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं। गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत, हिसार, रोहतक, नूंह, करनाल, रेवाड़ी, झज्जर और अंबाला समेत कई जिलों में बिजली संकट की स्थिति बताई जा रही है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में आपूर्ति पर असर की स्थिति अलग हो सकती है। जहां बिजली लंबे समय तक गुल है, वहां लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।

सबसे ज्यादा परेशानी उन परिवारों को हो रही है, जिन्हें बिजली के बिना घर के जरूरी काम निपटाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। गर्मी, उमस और अंधेरे के बीच लोगों को इनवर्टर की बैटरी खत्म होने के बाद मोबाइल की टॉर्च का सहारा लेना पड़ रहा है। बिजली पर निर्भर घरेलू उपकरण बंद होने से लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। वहीं, बच्चों की पढ़ाई, घर से काम करने वाले लोगों और छोटे कारोबारियों के सामने भी परेशानी खड़ी हो गई है।

बिजली संकट का असर केवल घरों तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में पेयजल आपूर्ति बाधित होने की शिकायतें हैं। बिजली से चलने वाले पंप और पानी की आपूर्ति से जुड़ी व्यवस्थाएं प्रभावित होने पर लोगों को पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिए पानी जुटाने में भी दिक्कत हो सकती है। शहरी क्षेत्रों की बहुमंजिला इमारतों और उन ग्रामीण इलाकों में स्थिति अधिक कठिन हो जाती है, जहां पानी की आपूर्ति बिजली से संचालित प्रणालियों पर निर्भर है।

औद्योगिक क्षेत्रों में भी हड़ताल का असर चिंता बढ़ा रहा है। बिजली आपूर्ति बाधित होने से फैक्ट्रियों और उत्पादन इकाइयों का कामकाज प्रभावित हो सकता है। मशीनों के बंद रहने, उत्पादन में देरी और समय पर माल तैयार नहीं होने से कारोबारियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। छोटे उद्योगों और उन इकाइयों के लिए समस्या अधिक गंभीर हो सकती है, जिनके पास लंबे समय तक काम चलाने के लिए वैकल्पिक बिजली व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। बिजली पर निर्भर दुकानों, कार्यशालाओं और सेवा क्षेत्र के कारोबार पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है।

इस बीच, बिजली संकट से परेशान लोगों का गुस्सा भी सामने आने लगा है। कुछ स्थानों पर लोगों के विरोध प्रदर्शन करने की जानकारी है। आम जनता की मांग है कि बिजली आपूर्ति जल्द बहाल की जाए, क्योंकि लंबे समय तक बिजली गुल रहने से पानी, घरेलू कामकाज और कारोबार जैसी बुनियादी जरूरतें प्रभावित होती हैं। लोगों के लिए यह समझना भी मुश्किल हो रहा है कि बिजली व्यवस्था से जुड़े विवाद की कीमत उन्हें क्यों चुकानी पड़ रही है।

निजीकरण के फैसले पर टकराव, सरकार ने कानूनी लड़ाई का दिया भरोसा

हड़ताल के पीछे मुख्य वजह हरियाणा विद्युत नियामक आयोग की ओर से गुरुग्राम और नूंह में बिजली वितरण व्यवस्था के लिए इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को 25 साल का समांतर लाइसेंस दिए जाने का फैसला है। कर्मचारी संगठनों को आशंका है कि इस व्यवस्था से बिजली वितरण क्षेत्र में निजी कंपनी की भूमिका बढ़ेगी और भविष्य में सरकारी बिजली निगमों के कामकाज तथा कर्मचारियों के हित प्रभावित हो सकते हैं। इसी आशंका के चलते कर्मचारी निजीकरण के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं। इस मुद्दे पर सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच बातचीत से भी समाधान नहीं निकल पाया। 20 अक्टूबर को ऊर्जा मंत्री अनिल विज के साथ हुई बातचीत विफल रहने के बाद कर्मचारी संगठनों ने 22 से 24 अक्टूबर तक हड़ताल करने का ऐलान किया। कर्मचारियों का विरोध ऐसे समय में सामने आया है, जब बिजली आपूर्ति प्रदेश के शहरी और ग्रामीण जनजीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है। 

हड़ताल लंबी खिंचने की स्थिति में आम जनता के साथ-साथ व्यापार और औद्योगिक गतिविधियों पर भी दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने स्पष्ट किया है कि सरकार इस फैसले के खिलाफ अपीलीय न्यायाधिकरण में कानूनी लड़ाई लड़ेगी। सरकार का कहना है कि निजी कंपनी को लाइसेंस दिए जाने के मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनौती दी जाएगी। मंत्रियों ने हड़ताल कर रहे कर्मचारियों से काम पर लौटने की अपील भी की है। सरकार की ओर से कर्मचारियों को यह संदेश दिया गया है कि विवाद का समाधान हड़ताल के बजाय कानूनी रास्ते से निकाला जाना चाहिए।

सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच जारी इस टकराव में अब सबसे बड़ा सवाल बिजली आपूर्ति को सामान्य करने का है। कर्मचारी निजीकरण के फैसले के विरोध में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, जबकि सरकार न्यायिक प्रक्रिया के जरिए मामले को आगे बढ़ाने की बात कह रही है। ऐसे में आम जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बातचीत का कोई नया रास्ता निकलता है या नहीं और बिजली व्यवस्था कब तक पूरी तरह सामान्य हो पाती है।

फिलहाल, हड़ताल से प्रभावित इलाकों में लोगों को बिजली, पानी और कारोबार से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो इसका असर और व्यापक हो सकता है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार और कर्मचारी संगठन आम जनता की कठिनाइयों को प्राथमिकता देते हुए ऐसा रास्ता निकालें, जिससे विवाद का समाधान भी हो और प्रदेश में बिजली आपूर्ति भी जल्द बहाल हो सके।

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