हिमाचल समेत छह राज्यों की सहमति से किशाऊ परियोजना पर कल दिल्ली में होगा करार, सीएम सुक्खू भी होंगे शामिल 

ऊपरी यमुना बेसिन की करीब 17 साल से अटकी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को अब आगे बढ़ने की उम्मीद जगी है। पानी के बंटवारे, लागत वहन और राज्यों के बीच सहमति को लेकर लंबे समय से उलझे इस बड़े प्रोजेक्ट पर मंगलवार को नई दिल्ली में महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होंगे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में होने वाले समारोह में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू भी शामिल होंगे। मुख्यमंत्री सोमवार दोपहर बाद दिल्ली के लिए रवाना हो गए। छह राज्यों के बीच होने वाला यह समझौता परियोजना को अंतिम मंजूरी की दिशा में ले जाने वाली अहम कड़ी माना जा रहा है। किशाऊ परियोजना को लेकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच सहमति बनने के बाद अब समझौते की औपचारिकता पूरी की जाएगी। मंगलवार को होने वाले समारोह में इन सभी राज्यों के प्रतिनिधि समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे। इसके बाद परियोजना को अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। लंबे समय से लंबित इस परियोजना को लेकर केंद्र सरकार की पहल से राज्यों के बीच प्रमुख मतभेद सुलझने का रास्ता साफ हुआ है।

किशाऊ परियोजना को लेकर जून में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में राज्यों के बीच पानी और लागत के बंटवारे से जुड़े मुख्य विवादों पर सहमति बनी थी। इसके तहत परियोजना के जल घटक की 90 फीसदी लागत केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी। शेष 10 फीसदी राशि छह राज्यों के बीच साझा की जाएगी। यह व्यवस्था परियोजना के निर्माण में राज्यों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जल घटक की लागत को लेकर बनी सहमति से लंबे समय से अटके निर्णय को आगे बढ़ाने में मदद मिली है।

परियोजना के समझौते में हिमाचल प्रदेश के लिए पानी और बिजली से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रावधान किया गया है। तय व्यवस्था के अनुसार हिमाचल के हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराया जाएगा। इसके बदले दोनों राज्य हिमाचल के हिस्से की बिजली घटक लागत में आर्थिक योगदान करेंगे। यानी हिमाचल को अपने आवंटित पानी के बदले परियोजना के बिजली हिस्से में वित्तीय भागीदारी का लाभ मिलेगा। यह व्यवस्था राज्य के हितों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। परियोजना से जुड़े छह राज्यों के बीच पानी और बिजली के घटकों का समन्वय समझौते का अहम हिस्सा होगा।

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है। टौंस यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है। परियोजना स्थल हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले और उत्तराखंड के देहरादून क्षेत्र की सीमा पर स्थित है। इस लिहाज से इसका सीधा प्रभाव दोनों राज्यों के भूभाग पर पड़ेगा। परियोजना का उद्देश्य केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊपरी यमुना बेसिन में जल भंडारण, सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों के लिए पानी उपलब्ध कराना भी है। इसके अलावा यमुना में स्वच्छ पानी का प्रवाह बढ़ाने और नदी के पुनर्जीवन में योगदान देने की भी योजना है।

किशाऊ परियोजना की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 660 मेगावाट होगी। इसके तहत 165 मेगावाट की चार इकाइयां स्थापित करने का प्रस्ताव है। परियोजना के बांध से करीब 1324 मिलियन क्यूबिक मीटर लाइव जल भंडारण क्षमता विकसित होगी। इस जल भंडारण का उपयोग विभिन्न राज्यों की सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा। परियोजना से करीब 97,076 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है। इससे कृषि क्षेत्र को पानी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

परियोजना के तहत करीब 236 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध का निर्माण प्रस्तावित है। इसकी मदद से पानी का भंडारण और बिजली उत्पादन किया जाएगा। परियोजना से सालाना करीब 1379 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान है। इस बिजली से संबंधित राज्यों को लाभ मिलने की संभावना है। जल भंडारण और बिजली उत्पादन की संयुक्त व्यवस्था के कारण किशाऊ परियोजना को ऊपरी यमुना बेसिन की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाओं में गिना जाता है। इसके पूरा होने पर क्षेत्र की जल और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

हिमाचल और उत्तराखंड में डूबेंगे 17 गांव, करीब 5,500 लोगों के पुनर्वास की चुनौती

किशाऊ परियोजना का हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार बांध बनने के बाद हिमाचल में करीब 1,498 हेक्टेयर और उत्तराखंड में 1,452 हेक्टेयर क्षेत्र पानी में डूब जाएगा। दोनों राज्यों में कुल 17 गांव प्रभावित होने का अनुमान है। परियोजना दस्तावेजों के अनुसार करीब 5,500 लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता पड़ सकती है। इस कारण परियोजना के निर्माण के साथ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और विस्थापन से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहेंगे। हिमाचल प्रदेश में करीब आठ गांव और लगभग 2,092 लोगों के प्रभावित होने का अनुमान है। राज्य के सिरमौर क्षेत्र में परियोजना के कारण डूब क्षेत्र बनने से स्थानीय आबादी और भूमि पर असर पड़ेगा। वहीं उत्तराखंड के देहरादून क्षेत्र में भी कई गांव प्रभावित होंगे। दोनों राज्यों के लिए पुनर्वास, मुआवजा, भूमि अधिग्रहण और प्रभावित परिवारों के हितों की सुरक्षा महत्वपूर्ण विषय रहेंगे। परियोजना को आगे बढ़ाने के दौरान इन मुद्दों पर भी आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

किशाऊ परियोजना के लिए हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड पहले ही संयुक्त उपक्रम बना चुके हैं। किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन जनवरी 2017 में किया गया था। इस संयुक्त उपक्रम के माध्यम से दोनों राज्यों की भागीदारी परियोजना के विकास में सुनिश्चित की गई है। अब छह राज्यों के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने से परियोजना के लिए बनी संस्थागत व्यवस्था को भी आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा। किशाऊ परियोजना को वर्ष 2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया था। राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने के बावजूद यह लंबे समय तक धरातल पर आगे नहीं बढ़ सकी। पानी के बंटवारे, लागत वहन और विभिन्न राज्यों के बीच सहमति न बन पाने के कारण परियोजना में देरी होती रही। करीब 17 वर्षों तक अटकी रहने के बाद अब केंद्र सरकार की पहल से इसमें नई उम्मीद जगी है। जून 2026 में छह राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर का रास्ता साफ हुआ।

मंगलवार को होने वाला समझौता परियोजना के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। हालांकि इसके बाद भी अंतिम मंजूरी और निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। समझौते पर हस्ताक्षर के बाद परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष अंतिम स्वीकृति के लिए रखा जाना है। इसके बाद निर्माण, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और अन्य आवश्यक कार्यों को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो सकेगी। किशाऊ परियोजना का महत्व हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। ऊपरी यमुना बेसिन में जल भंडारण बढ़ने से दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने के साथ पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। परियोजना के माध्यम से यमुना में स्वच्छ पानी का प्रवाह बढ़ाने की योजना भी है। इससे नदी के पुनर्जीवन और जल प्रबंधन को मजबूती मिलने की संभावना है। केंद्र सरकार के अनुसार किशाऊ परियोजना का उद्देश्य बिजली उत्पादन के साथ-साथ ऊपरी यमुना बेसिन में जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है। जल भंडारण से वर्ष भर पानी की उपलब्धता में सुधार लाने, सिंचाई क्षेत्र का विस्तार करने और विभिन्न राज्यों की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। छह राज्यों के बीच बनी सहमति इसी व्यापक उद्देश्य को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का मंगलवार को दिल्ली में होने वाले समारोह में शामिल होना राज्य के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। परियोजना में हिमाचल की हिस्सेदारी, पानी और बिजली लागत से जुड़ी व्यवस्था तथा प्रभावित क्षेत्रों के हितों से जुड़े मुद्दे समझौते के प्रमुख पक्ष हैं। मुख्यमंत्री की मौजूदगी से राज्य की भागीदारी और हितों को लेकर होने वाली औपचारिक प्रक्रिया पूरी होगी। अब सभी की नजरें मंगलवार को होने वाले समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर और इसके बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी पर टिकी हैं। यदि परियोजना को अंतिम स्वीकृति मिलती है तो लंबे समय से अटकी किशाऊ परियोजना के निर्माण का रास्ता खुल सकता है। 660 मेगावाट बिजली उत्पादन, 1324 मिलियन क्यूबिक मीटर जल भंडारण और करीब 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई सुविधा वाली यह परियोजना ऊपरी यमुना बेसिन के लिए बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है। साथ ही हिमाचल और उत्तराखंड के प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास और पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करना भी परियोजना की सफलता के लिए उतना ही जरूरी होगा।

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