लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की महत्वाकांक्षी योजना ‘एक देश, एक चुनाव’ को लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार की पहल अब निर्णायक चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। इस विषय पर गठित संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) तेजी से अपने काम को अंतिम रूप देने में जुटी है। समिति का लक्ष्य वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों तक देशभर में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू करने के लिए आवश्यक सुझाव और सिफारिशें तैयार करना है। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी का कहना है कि देश के विभिन्न राज्यों में आयोजित बैठकों, विशेषज्ञों के विचार-विमर्श और आम नागरिकों से मिले सुझावों के आधार पर इस प्रस्ताव को व्यापक समर्थन मिला है। उनके अनुसार, अब तक समिति के समक्ष अपनी राय रखने वाले लगभग 99 प्रतिशत लोगों और संस्थाओं ने इस व्यवस्था के पक्ष में अपनी सहमति जताई है। इससे यह संकेत मिलता है कि चुनावी सुधार के इस बड़े प्रस्ताव को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में सकारात्मक माहौल बन रहा है।
संयुक्त संसदीय समिति पिछले कई महीनों से अलग-अलग राज्यों का दौरा कर रही है और वहां की सरकारों, राजनीतिक दलों, विधि विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों, निर्वाचन व्यवस्था से जुड़े जानकारों तथा नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों से लगातार संवाद कर रही है। समिति का उद्देश्य केवल राजनीतिक दृष्टिकोण जानना नहीं, बल्कि इस व्यवस्था को लागू करने में आने वाली संवैधानिक, प्रशासनिक, वित्तीय और व्यावहारिक चुनौतियों का भी विस्तृत अध्ययन करना है। इसी क्रम में समिति ने हाल ही में गोवा का दौरा किया, जहां मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद के सदस्यों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से विस्तृत चर्चा की गई। गोवा दौरे में समिति के सदस्य और भारतीय जनता पार्टी के सांसद अनुराग ठाकुर भी शामिल रहे। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों का प्रभाव छोटे राज्यों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनके अनुसार, यदि सीमित संसाधनों वाले राज्य गोवा पर लगातार चुनावों का असर पड़ सकता है, तो स्वाभाविक रूप से बड़े राज्यों और पूरे देश की प्रशासनिक व्यवस्था, विकास योजनाओं और आर्थिक संसाधनों पर इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होता होगा। उनका कहना था कि चुनावी प्रक्रिया में बार-बार सरकारी मशीनरी की व्यस्तता विकास कार्यों की गति को प्रभावित करती है, जबकि एक साथ चुनाव होने से प्रशासन को अधिक समय विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मिल सकेगा।
समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने भी स्पष्ट किया कि विभिन्न राज्यों में हुई बैठकों के दौरान बड़ी संख्या में नागरिकों, सामाजिक संगठनों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों ने चुनाव एक साथ कराने के विचार का समर्थन किया है। उनका कहना है कि लगातार चुनाव होने से सरकारी खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि होती है और सुरक्षा बलों, प्रशासनिक अधिकारियों तथा शिक्षकों सहित बड़ी संख्या में कर्मचारियों की बार-बार चुनाव ड्यूटी लगानी पड़ती है। यदि लोकसभा और सभी विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाते हैं तो इससे समय, धन और संसाधनों की बचत होने के साथ-साथ शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सकती है। समिति केवल समर्थन जुटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन मुद्दों पर भी विस्तार से विचार कर रही है जिनके समाधान के बिना इस व्यवस्था को लागू करना संभव नहीं होगा। इनमें राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में संभावित बदलाव, संविधान में आवश्यक संशोधन, किसी सरकार के समय से पहले गिरने की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था और चुनाव आयोग की तैयारियों जैसे विषय प्रमुख हैं। इन सभी बिंदुओं पर विशेषज्ञों से विस्तार से राय ली जा रही है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की संवैधानिक या प्रशासनिक जटिलता उत्पन्न न हो।
लखनऊ दौरे के बाद संसद में पेश होगी अंतिम रिपोर्ट
गोवा दौरे के बाद अब संयुक्त संसदीय समिति का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ होगा। यहां समिति मुख्यमंत्री, विधानसभा में विपक्ष के नेता, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और संबंधित विभागों के विशेषज्ञों से चर्चा करेगी। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य होने के कारण यहां से मिलने वाले सुझावों को समिति की रिपोर्ट में विशेष महत्व दिया जा सकता है। समिति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी प्रमुख पक्षों की राय को अंतिम रिपोर्ट में समुचित स्थान मिले।
जेपीसी ने अपने कार्यक्रम के अनुसार 17 जुलाई को अपनी अंतिम रिपोर्ट को अंतिम रूप देने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके बाद यह रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की जाएगी।
रिपोर्ट में देशभर से प्राप्त सुझावों, विशेषज्ञों की राय, संवैधानिक पहलुओं और चुनावी व्यवस्था में संभावित सुधारों से जुड़े विस्तृत निष्कर्ष शामिल होंगे। संसद में रिपोर्ट पेश होने के बाद सरकार आगे की प्रक्रिया तय करेगी, जिसमें आवश्यक संवैधानिक संशोधन और संबंधित विधेयकों पर विचार किया जा सकता है। ‘एक देश, एक चुनाव’ का विचार लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। इसके समर्थकों का मानना है कि इससे चुनावी खर्च में भारी कमी आएगी, आचार संहिता बार-बार लागू होने से विकास कार्यों में आने वाली बाधाएं कम होंगी और प्रशासनिक मशीनरी को अधिक स्थिरता मिलेगी।
वहीं कुछ राजनीतिक दल और विशेषज्ञ इस व्यवस्था को लेकर संघीय ढांचे, राज्यों के अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े प्रश्न भी उठाते रहे हैं। इसी कारण संयुक्त संसदीय समिति सभी पक्षों की राय लेकर संतुलित और व्यवहारिक सिफारिशें तैयार करने का प्रयास कर रही है। यदि समिति की सिफारिशों पर सहमति बनती है और आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव देश की चुनावी व्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव के साक्षी बन सकते हैं। फिलहाल देश की निगाहें 17 जुलाई को पेश होने वाली संयुक्त संसदीय समिति की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं, क्योंकि इसी के आधार पर ‘एक देश, एक चुनाव’ की दिशा में आगे की रणनीति तय होगी।

