उत्तराखंड की जीवनरेखा माने जाने वाले देहरादून-ऋषिकेश मार्ग को आधुनिक और सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने भानियावाला-जॉलीग्रांट-ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन राजमार्ग परियोजना पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया है। लगभग 20 किलोमीटर लंबी इस परियोजना के पूरा होने के बाद देहरादून, जॉलीग्रांट हवाई अड्डे और ऋषिकेश के बीच आवागमन पहले की तुलना में कहीं अधिक सुगम और तेज होने की उम्मीद है। परियोजना का उद्देश्य केवल सड़क का चौड़ीकरण करना नहीं, बल्कि बढ़ते यातायात के दबाव को कम करना, चारधाम यात्रा को सुविधाजनक बनाना और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। हालांकि इस विकास परियोजना के साथ पर्यावरणीय चिंताएं भी जुड़ गई हैं। बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई को लेकर सामाजिक संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों ने विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है, जिससे विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी सामने आ गई है।
राष्ट्रीय राजमार्ग-07 पर बनाई जा रही इस महत्वाकांक्षी परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 743 करोड़ रुपये है। इसे हाइब्रिड एन्युटी मोड के तहत विकसित किया जा रहा है, जिसमें परियोजना के निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी निजी कंपनी और सरकार मिलकर निभाती हैं। एनएचएआई का कहना है कि यह परियोजना राज्य के सबसे व्यस्त मार्गों में शामिल देहरादून-ऋषिकेश कॉरिडोर को नई पहचान देगी।
भानियावाला से जॉलीग्रांट होते हुए ऋषिकेश तक का यह मार्ग चारधाम यात्रा का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इसी रास्ते से बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा के लिए आगे बढ़ते हैं। इसके अलावा जॉलीग्रांट हवाई अड्डे से आने-जाने वाले यात्रियों, स्थानीय लोगों, पर्यटकों और व्यावसायिक वाहनों का भी इसी मार्ग पर भारी दबाव रहता है।
पर्यटन सीजन और चारधाम यात्रा के दौरान इस सड़क पर कई बार लंबा जाम लग जाता है, जिससे यात्रियों को घंटों तक परेशानी झेलनी पड़ती है। एनएचएआई का दावा है कि परियोजना पूरी होने के बाद इस मार्ग पर यातायात काफी सुगम हो जाएगा। देहरादून से ऋषिकेश तक की यात्रा, जिसमें वर्तमान में ट्रैफिक के कारण काफी समय लग जाता है, भविष्य में लगभग 30 मिनट में पूरी की जा सकेगी। इससे यात्रियों का समय बचेगा, ईंधन की खपत कम होगी और परिवहन व्यवस्था अधिक प्रभावी बनेगी। साथ ही जॉलीग्रांट हवाई अड्डे तक पहुंचना भी पहले की तुलना में आसान हो जाएगा। परियोजना की एक महत्वपूर्ण विशेषता वन्यजीव संरक्षण को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यह मार्ग राजाजी टाइगर रिजर्व के संवेदनशील क्षेत्र से होकर गुजरता है, जहां हाथियों और अन्य वन्यजीवों का नियमित आवागमन होता है। इसी कारण सड़क निर्माण के दौरान वन्यजीवों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है।
परियोजना के तहत लगभग 3.5 किलोमीटर लंबे पांच एलीफेंट कॉरिडोर बनाए जाएंगे, ताकि हाथी बिना किसी बाधा के एक जंगल से दूसरे जंगल तक सुरक्षित आवाजाही कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वन्यजीवों और वाहनों के बीच होने वाली दुर्घटनाओं में कमी आएगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष भी घटेगा।हालांकि परियोजना को लेकर पर्यावरण से जुड़े सवाल भी उठने लगे हैं। सड़क चौड़ीकरण के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है, जिसका सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने विरोध शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन इसके लिए पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनका आग्रह है कि जितने पेड़ काटे जाएं, उससे अधिक संख्या में नए पौधे लगाए जाएं और वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। दूसरी ओर परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सभी कार्य पर्यावरणीय स्वीकृतियों और निर्धारित नियमों के अनुसार किए जा रहे हैं। वन्यजीवों की सुरक्षा, जल निकासी व्यवस्था, सड़क सुरक्षा और हरित विकास के मानकों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। उनका दावा है कि सड़क निर्माण के साथ पर्यावरण संरक्षण के उपाय भी समानांतर रूप से लागू किए जाएंगे।
आने वाले वर्षों में चारधाम यात्रा, धार्मिक पर्यटन और जॉलीग्रांट हवाई अड्डे पर यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ने की संभावना है। ऐसे में यदि समय रहते सड़क अवसंरचना का विस्तार नहीं किया जाता, तो भविष्य में यातायात की समस्या और गंभीर हो सकती है। वर्तमान में कई स्थानों पर सड़क संकरी होने के कारण वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं और दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है। सड़क के चौड़ीकरण से इन समस्याओं में काफी हद तक राहत मिलने की उम्मीद है। यह परियोजना केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की पर्यटन, धार्मिक यात्रा और आर्थिक गतिविधियों को नई गति देने वाली महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना के रूप में भी देखी जा रही है। एक ओर इससे देहरादून, ऋषिकेश और जॉलीग्रांट हवाई अड्डे के बीच संपर्क बेहतर होगा, वहीं दूसरी ओर चारधाम यात्रा पर आने वाले लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा का लाभ मिलेगा।
परियोजना पर एनएचएआई का जवाब, कहा- पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से कोई समझौता नहीं–
भानियावाला-जॉलीग्रांट-ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना को लेकर उठ रहे पर्यावरण संबंधी सवालों और सोशल मीडिया पर प्रसारित दावों के बीच भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है। प्राधिकरण ने कहा है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना का उद्देश्य केवल आधुनिक और सुरक्षित सड़क का निर्माण करना नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, वन क्षेत्र की सुरक्षा और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन को भी समान प्राथमिकता देना है। एनएचएआई ने यह भी स्पष्ट किया कि परियोजना से जुड़े कुछ समाचारों और सोशल मीडिया पोस्ट में यह दावा किया जा रहा है कि वृक्षों की कटाई उच्च न्यायालय के आदेशों के विपरीत की जा रही है, जबकि यह पूरी तरह तथ्यहीन और भ्रामक है। प्राधिकरण का कहना है कि परियोजना से संबंधित सभी कार्य आवश्यक वन एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियां प्राप्त करने और न्यायालय के निर्देशों का पालन करने के बाद ही शुरू किए गए हैं।
एनएचएआई के परियोजना निदेशक, परियोजना क्रियान्वयन इकाई (पीआईयू) देहरादून के सौरभ सिंह ने बताया कि परियोजना की रूपरेखा तैयार करते समय सड़क की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम रखने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
उन्होंने कहा कि परियोजना का वन क्षेत्र वाला हिस्सा इस प्रकार तैयार किया गया है कि वहां वन भूमि का उपयोग कम से कम हो। इसी उद्देश्य से सड़क के लिए आवश्यक ‘राइट ऑफ वे’ को भी सीमित रखा गया है, ताकि अनावश्यक रूप से जंगल प्रभावित न हों। उन्होंने बताया कि परियोजना की डिजाइन तैयार करने में उत्तराखंड वन विभाग, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के विशेषज्ञों की तकनीकी सलाह ली गई है। उनके सुझावों के आधार पर हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए विशेष संरचनाओं को परियोजना का हिस्सा बनाया गया है। एनएचएआई का मानना है कि इन उपायों से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन में किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी और सड़क दुर्घटनाओं में वन्यजीवों की मौत की घटनाओं में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। परियोजना के तहत हाथियों के सुरक्षित आवागमन के लिए एक प्रमुख पुल-सह-हाथी अंडरपास और चार समर्पित हाथी अंडरपास बनाए जा रहे हैं।
इनकी कुल लंबाई लगभग 3.5 किलोमीटर होगी। इसके अलावा बाघ, तेंदुआ, सियार, जंगल बिल्ली, साही, जंगली सूअर, सांभर और चीतल जैसे बड़े वन्यजीवों के लिए छह विशेष बॉक्स कल्वर्ट तैयार किए जा रहे हैं। वहीं सरीसृपों, उभयचरों और अन्य छोटे वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए 13 पाइप कल्वर्ट भी बनाए जाएंगे। इन संरचनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सड़क निर्माण के बावजूद वन्यजीवों का प्राकृतिक मार्ग बाधित न हो। एनएचएआई ने बताया कि परियोजना में केवल अंडरपास ही नहीं, बल्कि वन्यजीव सुरक्षा से जुड़े कई अन्य आधुनिक उपाय भी शामिल किए गए हैं। इनमें ग्रीन गाइड हेज, ध्वनि अवरोधक (साउंड बैरियर), एंटी-ग्लेयर स्क्रीन, वन्यजीव चेतावनी संकेतक, गति नियंत्रण उपाय तथा ‘नो हॉर्न’ क्षेत्र जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इन उपायों का उद्देश्य मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव को कम करना, सड़क दुर्घटनाओं की संभावना घटाना और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
परियोजना निदेशक सौरभ सिंह ने बताया कि वन भूमि पर प्रभाव को कम करने के लिए परियोजना के वन क्षेत्र में सड़क की चौड़ाई के लिए निर्धारित ‘राइट ऑफ वे’ को 60 मीटर से घटाकर केवल 23 मीटर कर दिया गया है। इससे अतिरिक्त वन भूमि के उपयोग की आवश्यकता काफी कम हो गई है और बड़ी मात्रा में वन क्षेत्र को संरक्षित रखा जा सकेगा। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए आवश्यक वित्तीय प्रावधान भी किए गए हैं। एनएचएआई ने प्रतिपूरक वनीकरण और अगले दस वर्षों तक उसके रखरखाव के लिए 1.97 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा कराई है। इसके अतिरिक्त राज्य में हरित क्षेत्र बढ़ाने के उद्देश्य से 40 हेक्टेयर गैर-वन भूमि राज्य सरकार द्वारा वन विभाग को हस्तांतरित की गई है, जहां भविष्य में नए वन विकसित किए जाएंगे।

