17 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के मामले में हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस

दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 17 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर अब न्यायपालिका ने गंभीर चिंता जताई है। उनकी जान को संभावित खतरे को देखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि किसी भी नागरिक के जीवन की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस मामले में किसी भी प्रकार की देरी स्वीकार नहीं की जा सकती। बुधवार को इस मामले पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनम वांगचुक को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने, जरूरत पड़ने पर उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने और यदि चिकित्सकीय रूप से आवश्यक हो तो जीवन बचाने के लिए जबरन पोषण या चिकित्सकीय सहायता दिए जाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई की। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने इसकी अगली सुनवाई अगले ही दिन यानी गुरुवार, 16 जुलाई को तय कर दी। 

सोनम वांगचुक पिछले 17 दिनों से जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे हैं। बताया जा रहा है कि वह केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। लंबे समय से भोजन नहीं लेने के कारण उनकी सेहत को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। इसी को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी गंभीरता से नोट किया कि इतने संवेदनशील और आपातकालीन मामले की सुनवाई के समय केंद्र सरकार की ओर से कोई भी अधिवक्ता उपस्थित नहीं था। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए निर्देश दिया कि केंद्र सरकार तक तत्काल नोटिस पहुंचाया जाए, ताकि अगली सुनवाई में उसका पक्ष भी अदालत के समक्ष रखा जा सके। 

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि नोटिस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तथा स्टैंडिंग काउंसिल (सिविल) के माध्यम से तत्काल भेजा जाए। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मामले से जुड़े सभी पक्ष अगली सुनवाई में उपस्थित रहें और वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति पर आवश्यक निर्णय लेने में किसी प्रकार की बाधा न आए। अदालत ने माना कि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक भूख हड़ताल पर रहता है और उसकी जान को खतरा उत्पन्न हो जाता है, तो राज्य का दायित्व है कि उसके जीवन की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। यही कारण है कि अदालत ने मामले को अत्यंत संवेदनशील मानते हुए त्वरित सुनवाई का निर्णय लिया।

याचिका में तत्काल चिकित्सा सहायता और जरूरत पड़ने पर जबरन पोषण देने की मांग

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि सोनम वांगचुक की शारीरिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है और यदि समय रहते चिकित्सकीय सहायता नहीं मिली तो उनके जीवन पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि केंद्र और दिल्ली सरकार को तत्काल आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए जाएं। याचिका में मांग की गई है कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम तुरंत जंतर-मंतर पहुंचकर सोनम वांगचुक की विस्तृत चिकित्सकीय जांच करे। यदि जांच में उनकी स्थिति गंभीर पाई जाती है, तो उन्हें बिना देरी किए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) या किसी अन्य बड़े सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाए।

इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि डॉक्टरों की राय में उनके जीवन को बचाने के लिए चिकित्सकीय हस्तक्षेप आवश्यक हो, तो उन्हें ग्लूकोज, तरल पोषण या अन्य जरूरी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए, भले ही इसके लिए चिकित्सकीय निगरानी में जबरन पोषण देना पड़े। याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारतीय संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है और इस दायित्व से सरकार पीछे नहीं हट सकती। अब इस पूरे मामले पर देशभर की नजरें गुरुवार, 16 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। 

माना जा रहा है कि अदालत वांगचुक की मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति, डॉक्टरों की रिपोर्ट और सरकार का पक्ष सुनने के बाद आगे के निर्देश जारी कर सकती है। यदि अदालत को लगता है कि उनकी जान तत्काल खतरे में है, तो चिकित्सा सहायता, अस्पताल में भर्ती कराने और जीवन रक्षक उपचार को लेकर महत्वपूर्ण आदेश दिए जा सकते हैं। यह मामला अब केवल एक विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जीवन के अधिकार, राज्य की जिम्मेदारी और संवैधानिक दायित्व जैसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों से भी जुड़ गया है। ऐसे में आज होने वाली सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shopping Cart