अब रेल की रफ्तार के साथ पर्यावरण संरक्षण भी चलेगा। भारत पहली बार हाइड्रोजन ऊर्जा से चलने वाली ट्रेन को पटरियों पर उतारने जा रहा है। यह सिर्फ नई तकनीक नहीं, बल्कि स्वच्छ, आत्मनिर्भर और टिकाऊ भारत की दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है। भारतीय रेलवे स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। देश की पहली ग्रीन हाइड्रोजन से संचालित ट्रेन अब लॉन्च के लिए पूरी तरह तैयार है। यह परियोजना भारत के रेल नेटवर्क को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की महत्वाकांक्षी योजना का हिस्सा है। हाइड्रोजन तकनीक पर आधारित यह ट्रेन बिना धुआं छोड़े चलेगी और इसके संचालन से रेलवे के कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की उम्मीद है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक फेसबुक अकाउंट पर इस ट्रेन की तस्वीरें साझा करते हुए इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि भारत की पहली हाइड्रोजन-पावर्ड ट्रेन हरियाणा से अपनी यात्रा शुरू करने जा रही है। प्रधानमंत्री की इस घोषणा के बाद इस परियोजना को लेकर देशभर में उत्सुकता बढ़ गई है। इसे भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण और हरित ऊर्जा की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 जुलाई को हरियाणा के दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वे कई विकास परियोजनाओं से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। इसी अवसर पर देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगी।
यह परियोजना हरियाणा के साथ-साथ पूरे देश के लिए स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन की नई शुरुआत मानी जा रही है। प्रधानमंत्री पहले ही सोशल मीडिया के माध्यम से इस ट्रेन की तस्वीरें साझा कर इसके महत्व को रेखांकित कर चुके हैं। भारतीय रेलवे ने इस परियोजना को ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ योजना के तहत विकसित किया है। इसका उद्देश्य विरासत और ग्रामीण रेल मार्गों पर चलने वाले डीजल इंजनों को धीरे-धीरे हाइड्रोजन आधारित ट्रेनों से बदलना है। रेलवे का लक्ष्य आने वाले समय में 35 और हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन शुरू करना है, जिससे स्वच्छ और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा मिल सके।
आधुनिक सुविधाओं से लैस है ट्रेन, 682 यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है
देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को 10 डिब्बों वाले डीईएमयू रेक के रूप में तैयार किया गया है। इसमें 682 यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है, जबकि कुल लगभग 2,600 यात्रियों को ले जाने की क्षमता है। परीक्षण के दौरान ट्रेन ने बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन शुरुआती चरण में सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इसकी अधिकतम परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है। रेलवे का कहना है कि यह एक पायलट परियोजना है। इसलिए शुरुआती संचालन के दौरान ट्रेन के प्रदर्शन, सुरक्षा और रखरखाव पर विशेष नजर रखी जाएगी।
हाइड्रोजन ट्रेन फ्यूल सेल तकनीक पर आधारित होती है। इसमें संग्रहित हाइड्रोजन गैस को वातावरण से मिलने वाली ऑक्सीजन के साथ फ्यूल सेल में प्रतिक्रिया कराई जाती है।
इस प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है, जो ट्रेन के इलेक्ट्रिक मोटरों को चलाती है। इस पूरी प्रक्रिया में न तो कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है और न ही धुएं का उत्सर्जन होता है। इसके बजाय केवल जलवाष्प और ऊष्मा निकलती है। यही कारण है कि इसे शून्य-उत्सर्जन तकनीक माना जाता है। देश में कई ऐसे रेल मार्ग हैं, जहां ओवरहेड विद्युत लाइनें बिछाना बेहद कठिन या खर्चीला है। ऐसे इलाकों में हाइड्रोजन ट्रेनें डीजल इंजनों का प्रभावी विकल्प बन सकती हैं। इन ट्रेनों में डीजल ट्रेनों की तरह कम समय में ईंधन भरकर दोबारा संचालन शुरू किया जा सकता है, जबकि पर्यावरणीय लाभ इलेक्ट्रिक ट्रेनों जैसे मिलते हैं।
भारतीय रेलवे वर्ष 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना इसी लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में देश के कई अन्य मार्गों पर भी हाइड्रोजन ट्रेनें दौड़ती दिखाई देंगी। यह पहल केवल एक नई ट्रेन का संचालन नहीं है, बल्कि भारत की तकनीकी क्षमता, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है। हरियाणा से शुरू होने वाली यह यात्रा भारतीय रेल को भविष्य की नई दिशा देने का आधार बन सकती है।

