जब पहाड़ों की बर्फ समय से पहले पिघलने लगे, नदियों का स्वच्छ जल प्रदूषण से बोझिल हो जाए, जंगलों की हरियाली कंक्रीट के जंगलों में बदलने लगे और मौसम का स्वाभाविक चक्र असामान्य होने लगे, तब यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि पृथ्वी एक गंभीर पर्यावरणीय संकट के दौर से गुजर रही है। मानव सभ्यता ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन विकास की इस तेज रफ्तार ने प्रकृति पर ऐसा दबाव भी बनाया है जिसकी कीमत पूरी दुनिया चुका रही है। आज दुनिया के लगभग हर देश में जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जल संकट, भूमि क्षरण और जैव विविधता में कमी जैसे मुद्दे चिंता का विषय बने हुए हैं। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा, जंगलों में आग और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। वैज्ञानिक वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
प्रकृति केवल मानव जीवन का सहायक तत्व नहीं है, बल्कि जीवन का मूल आधार है। मनुष्य जिस हवा में सांस लेता है, जिस पानी से अपनी प्यास बुझाता है, जिस मिट्टी से अन्न प्राप्त करता है और जिन प्राकृतिक संसाधनों से अपना जीवन संचालित करता है, वे सभी पर्यावरण की देन हैं। भारतीय संस्कृति में भी प्रकृति को पूजनीय माना गया है। वेदों और उपनिषदों में पृथ्वी, जल, वायु और वनस्पतियों को जीवन का आधार बताया गया है। अथर्ववेद का प्रसिद्ध वाक्य “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः” यह संदेश देता है कि पृथ्वी हमारी माता है और उसका संरक्षण हमारा कर्तव्य है। इसी सोच को वैश्विक स्तर पर मजबूत करने और लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल औपचारिक कार्यक्रमों का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति मानव समाज की जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण अवसर है।
दुनिया भर में इस दिन वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, पर्यावरणीय संगोष्ठियां, जागरूकता रैलियां और विभिन्न जन-अभियान आयोजित किए जाते हैं। विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत वर्ष 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन के बाद हुई। इस सम्मेलन में पहली बार पर्यावरण संरक्षण को वैश्विक एजेंडा का प्रमुख विषय बनाया गया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। वर्ष 1973 से इसका औपचारिक आयोजन शुरू हुआ और आज यह दुनिया के 150 से अधिक देशों में मनाया जाता है। विश्व पर्यावरण दिवस का मुख्य उद्देश्य लोगों को पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति जागरूक करना, सतत विकास को बढ़ावा देना और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रेरित करना है। यह दिवस यह याद दिलाता है कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता भी उतनी ही आवश्यक है।
बढ़ता पर्यावरणीय संकट और अब चेतने की आवश्यकता
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती के रूप में सामने आया है। औद्योगिक गतिविधियों, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन, जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग और वनों की कटाई ने वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड सहित ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ा दी है। इसके कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और मौसम संबंधी आपदाओं की आवृत्ति तथा तीव्रता में वृद्धि हो रही है। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। कई शहरों में वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती है।
नदियों में बढ़ता प्रदूषण, भूजल का गिरता स्तर और घटते वन क्षेत्र गंभीर चिंता का विषय हैं। हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं, जहां ग्लेशियरों के सिकुड़ने और अनियमित मौसम की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। यदि पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए अब केवल चर्चा का समय नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदारी का समय है। पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय अपनाए जा सकते हैं। अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाए और लगाए गए पौधों की देखभाल सुनिश्चित की जाए।
प्लास्टिक के उपयोग को कम किया जाए तथा पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जाए। जल और बिजली की अनावश्यक बर्बादी रोकी जाए। सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाया जाए। प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की आदत विकसित की जाए। बच्चों और युवाओं में पर्यावरणीय शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाए ताकि भविष्य की पीढ़ियां प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बन सकें। विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संदेश है। पृथ्वी हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। यदि आज हम पर्यावरण की रक्षा के लिए गंभीर नहीं हुए तो भविष्य में प्रकृति का असंतुलन मानव अस्तित्व के लिए बड़ा संकट बन सकता है। इसलिए यह समय प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने, संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग को अपनाने और पर्यावरण संरक्षण को जन-आंदोलन बनाने का है। यही विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक संदेश और उद्देश्य है।

