देश की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर क्षेत्र में हर साल सर्दियों के मौसम के साथ लौटने वाला वायु प्रदूषण का संकट अब केंद्र सरकार की प्राथमिकता बन गया है। प्रदूषण के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के तहत केंद्र सरकार ने एक बड़ा और महत्वाकांक्षी कदम उठाया है। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिल्ली-एनसीआर में पुराने प्रदूषण फैलाने वाले ट्रकों और बसों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उनकी जगह आधुनिक बीएस-6 और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने वाली विशेष योजना को मंजूरी दे दी है। करीब 9,585 करोड़ रुपये की लागत वाली यह दो वर्षीय योजना केवल वाहनों को बदलने की पहल नहीं है, बल्कि दिल्ली-एनसीआर की हवा को स्वच्छ बनाने और लाखों लोगों को प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
केंद्र सरकार का मानना है कि यदि इस योजना का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन हुआ तो आने वाले वर्षों में राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण के स्तर में उल्लेखनीय कमी देखी जा सकती है। दिल्ली-एनसीआर लंबे समय से देश के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में शामिल रहा है। हर वर्ष अक्टूबर से जनवरी के बीच वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रदूषण के पीछे पराली, औद्योगिक उत्सर्जन और निर्माण गतिविधियों के साथ-साथ पुराने डीजल वाहनों की बड़ी भूमिका होती है। विशेष रूप से भारी ट्रक और बसें वायु प्रदूषण में अपेक्षाकृत अधिक योगदान देती हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने पुराने वाहनों को हटाने और स्वच्छ तकनीक अपनाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन का मॉडल तैयार किया है। योजना के तहत लगभग 2.07 लाख वाहन मालिकों को सीधा लाभ मिलने का अनुमान है। इनमें करीब 1.91 लाख ट्रकों और 16,329 बसों के मालिक शामिल हैं। योजना के लिए निर्धारित कुल बजट में केंद्र सरकार 5,041 करोड़ रुपये का योगदान देगी, जबकि दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित भागीदार राज्यों की ओर से कर राहत और शुल्क छूट के रूप में लगभग 1,601 करोड़ रुपये की सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
योजना का वित्तपोषण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड (NCRPB) के माध्यम से किया जाएगा। मोदी सरकार के अनुसार एनसीआर क्षेत्र में पीएम 2.5 प्रदूषण का लगभग 14 प्रतिशत, कार्बन मोनोऑक्साइड का 40 प्रतिशत और नाइट्रोजन ऑक्साइड का 63 प्रतिशत उत्सर्जन परिवहन क्षेत्र से आता है। चौंकाने वाली बात यह है कि कुल वाहनों में मात्र 3 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले ट्रक और बसें पीएम 2.5 उत्सर्जन में लगभग 36 प्रतिशत योगदान देती हैं। यही कारण है कि योजना का मुख्य फोकस भारी वाहनों पर रखा गया है। पुराने बीएस-3 और उससे नीचे के मानक वाले वाहनों को अधिकृत वाहन स्क्रैपिंग केंद्रों पर भेजना अनिवार्य होगा। वहीं बीएस-4 वाहनों को एनसीआर के बाहर गैर-एनसीएपी शहरों और कस्बों में बेचा जा सकेगा या फिर स्क्रैप कराया जा सकेगा। इसके बाद वाहन मालिकों को बीएस-6, उससे बेहतर मानकों वाले या इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने होंगे।
ब्याज सब्सिडी, ईंधन वाउचर और टैक्स छूट से मिलेगा बड़ा लाभ
योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि सरकार वाहन मालिकों को केवल पुराने वाहन हटाने के लिए नहीं कह रही, बल्कि उन्हें आर्थिक सहायता भी प्रदान करेगी। केंद्र सरकार पांच वर्षों तक लिए गए ऋण पर 5 प्रतिशत तक ब्याज सब्सिडी देगी। इसके अलावा वाहन की श्रेणी के अनुसार हर महीने 4,800 रुपये तक के ईंधन वाउचर भी उपलब्ध कराए जाएंगे। यदि कोई वाहन मालिक इलेक्ट्रिक वाहन खरीदता है तो उसे अतिरिक्त एकमुश्त प्रोत्साहन राशि भी मिलेगी। इसके अलावा जमा प्रमाणपत्रों के व्यापार से जुड़े लाभ भी उपलब्ध होंगे, जिससे स्वच्छ तकनीक अपनाने के लिए अतिरिक्त प्रेरणा मिलेगी। राज्य सरकारों की ओर से भी वाहन मालिकों को व्यापक राहत देने की तैयारी की गई है। नए वाहनों के पंजीकरण शुल्क को पूरी तरह माफ किया जाएगा। मोटर वाहन कर में भी बड़ी छूट मिलेगी।
नए वाहनों पर 100 प्रतिशत तक और पुराने वाहनों पर 50 प्रतिशत तक कर राहत का प्रावधान किया गया है। यह छूट अगले 10 वर्षों तक प्रभावी रहेगी। इसके अलावा राज्यों द्वारा पुराने वाहनों से संबंधित कई लंबित देनदारियों को भी माफ करने का प्रस्ताव रखा गया है। इससे छोटे ट्रांसपोर्टरों और बस संचालकों पर वित्तीय दबाव कम होगा। योजना को सफल बनाने के लिए ऑटोमोबाइल कंपनियों को भी साझेदार बनाया गया है। कंपनियां नए वाहनों की एक्स-शोरूम कीमत पर 8 प्रतिशत तक की छूट देंगी। इससे वाहन प्रतिस्थापन की लागत और कम होगी तथा वाहन मालिकों को नई तकनीक अपनाने में आसानी होगी।
केंद्र सरकार ने योजना के संचालन को पूरी तरह डिजिटल बनाने का निर्णय लिया है। इसके लिए एक एकीकृत डिजिटल पोर्टल विकसित किया जाएगा, जहां पात्रता जांच, आवेदन प्रक्रिया, ब्याज सब्सिडी, ईंधन वाउचर वितरण और प्रदूषण में कमी की निगरानी रियल टाइम में की जाएगी। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और लाभार्थियों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। योजना की निगरानी कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय अधिकार प्राप्त समिति करेगी। इसमें विभिन्न मंत्रालयों, नीति आयोग, दिल्ली-एनसीआर राज्यों और एनसीआरपीबी के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
वहीं जिला स्तर पर जिला कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट इसके प्रभावी क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालेंगे। यदि योजना निर्धारित समयसीमा के भीतर सफलतापूर्वक लागू हुई तो दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में यह पिछले एक दशक की सबसे बड़ी पहल साबित हो सकती है। आने वाली सर्दियों से पहले इसकी जमीनी तैयारियां शुरू होने की संभावना है और इससे राजधानी की हवा को स्वच्छ बनाने की मुहिम को नई गति मिल सकती है।

