राजधानी देहरादून में लगातार हो रही बारिश के बीच नंदा की चौकी स्थित टौंस नदी पर बने नए पुल की एप्रोच रोड धंसने की घटना ने एक बार फिर निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब 300 दिनों के लंबे इंतजार और करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किए गए इस पुल को 12 जुलाई 2026 को आम लोगों के लिए खोला गया था, लेकिन शुरू होने के महज 16 दिन बाद ही इसके एप्रोच मार्ग का एक हिस्सा धंस गया। घटना के बाद कुछ समय के लिए यातायात रोकना पड़ा और क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। सोमवार को हुई लगातार बारिश के बीच पुल के एप्रोच रोड पर अचानक बड़ा गड्ढा बन गया। सूचना मिलते ही प्रशासन, लोक निर्माण विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों की टीमें मौके पर पहुंचीं। सुरक्षा को देखते हुए पुल पर वाहनों की आवाजाही अस्थायी रूप से रोक दी गई, ताकि किसी प्रकार की दुर्घटना न हो। इस दौरान दोनों ओर वाहनों की कतारें लग गईं और रोजाना इस मार्ग का उपयोग करने वाले हजारों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तुरंत अधिकारियों से जानकारी ली और घटनास्थल पर पहुंचकर स्थिति का आकलन करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को एक घंटे के भीतर यातायात बहाल करने, क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत शुरू करने और पूरी घटना की तकनीकी जांच कराने के निर्देश दिए। इसके बाद विभागीय अधिकारियों ने मौके पर राहत एवं मरम्मत कार्य शुरू कराया और वैकल्पिक व्यवस्था के साथ यातायात को सुचारु बनाने का प्रयास किया। विभागीय अधिकारियों के अनुसार पुल की मुख्य संरचना पूरी तरह सुरक्षित है और उसे किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचा है। उनका कहना है कि केवल एप्रोच रोड का एक हिस्सा धंसा है, जबकि पुल के पिलर, डेक और अन्य संरचनात्मक हिस्से सुरक्षित हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इसे पुल क्षतिग्रस्त होने की घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि समस्या केवल संपर्क मार्ग के एक हिस्से तक सीमित है।
नंदा की चौकी पुल देहरादून और विकासनगर क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। यह मार्ग प्रेमनगर, विकासनगर, सेलाकुई, पांवटा साहिब और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ता है। रोजाना हजारों कर्मचारी, छात्र, व्यापारी, उद्योगों में काम करने वाले श्रमिक और स्थानीय निवासी इसी मार्ग से आवागमन करते हैं। ऐसे में एप्रोच रोड धंसने की घटना ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।यह पुल पिछले वर्ष आई आपदा के बाद बनाया गया था। सितंबर 2025 में टौंस नदी में आई बाढ़ और अतिवृष्टि के कारण पुराना पुल गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके बाद यहां नए पुल के निर्माण का निर्णय लिया गया। लंबे समय तक निर्माण कार्य चलने के कारण स्थानीय लोगों को वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेना पड़ा। लगभग 300 दिनों तक चले निर्माण कार्य के बाद जब 12 जुलाई 2026 को पुल यातायात के लिए खोला गया तो लोगों ने राहत की सांस ली थी। हालांकि अब एप्रोच रोड धंसने की घटना ने उनकी उम्मीदों को झटका दिया है।
16 करोड़ की लागत से बना पुल, अब जांच के घेरे में निर्माण कार्य
जानकारी के अनुसार इस पुल का निर्माण करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से किया गया है। निर्माण कार्य लोक निर्माण विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की निगरानी में कराया गया था। पुल को आधुनिक तकनीक के आधार पर तैयार किया गया, जिसमें वेल फाउंडेशन तकनीक, मजबूत आरसीसी सुरक्षा दीवारें और उच्च क्षमता वाले पिलरों का उपयोग किया गया। दावा किया गया था कि यह पुल बाढ़, तेज बहाव और अन्य प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होगा। इसके बावजूद एप्रोच रोड धंसने की घटना के बाद स्थानीय लोगों ने निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य पूरी गुणवत्ता और मानकों के अनुरूप हुआ होता तो पहली ही बड़ी बारिश में ऐसी स्थिति नहीं बनती। कई लोगों ने यह भी मांग की है कि निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि एप्रोच रोड धंसने के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं।
हालांकि विभाग का कहना है कि लगातार हो रही भारी बारिश और पानी के दबाव के कारण एप्रोच क्षेत्र में मिट्टी का कटाव हुआ, जिससे सड़क का हिस्सा धंस गया। अधिकारियों के मुताबिक प्रारंभिक जांच में निर्माण संबंधी किसी बड़ी खामी के संकेत नहीं मिले हैं। फिर भी विशेषज्ञों की टीम पूरे मामले का अध्ययन कर रही है और विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है। पर्वतीय और नदी किनारे वाले क्षेत्रों में पुल की मुख्य संरचना सुरक्षित होने के बावजूद एप्रोच रोड सबसे संवेदनशील हिस्सा होती है। लगातार बारिश, जल निकासी की खराब व्यवस्था और मिट्टी के कटाव के कारण ऐसे हिस्सों को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए एप्रोच रोड की सुरक्षा और रखरखाव पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
उत्तराखंड में इससे पहले भी कई बार प्राकृतिक आपदाओं के कारण पुलों और सड़कों को नुकसान पहुंच चुका है। वर्ष 2008 में हल्द्वानी की गौला नदी पर बना आरसीसी बाईपास पुल प्रभावित हुआ था। वर्ष 2012 में अस्सी गंगा घाटी में कई पुल क्षतिग्रस्त हुए थे। वहीं 2013 की केदारनाथ आपदा में रामबाड़ा पुल सहित राज्यभर में लगभग 147 पुल और 1300 से अधिक सड़कें प्रभावित हुई थीं। ऐसे में नंदा की चौकी पुल की एप्रोच रोड धंसने की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि संवेदनशील क्षेत्रों में बनाए जा रहे बुनियादी ढांचे की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए और क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
फिलहाल मरम्मत कार्य जारी है और विभाग का दावा है कि पुल पूरी तरह सुरक्षित है, लेकिन घटना ने निर्माण गुणवत्ता, निगरानी तंत्र और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को लेकरनई बहस जरूर छेड़ दी है। स्थानीय लोगों की मांग है कि केवल मरम्मत तक सीमित रहने के बजाय पूरे परियोजना क्षेत्र का तकनीकी ऑडिट कराया जाए, ताकि भविष्य में इस महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग पर दोबारा ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो और लोगों को सुरक्षित एवं निर्बाध आवागमन की सुविधा मिल सके।

