नीट पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में हुए छात्र आंदोलनों के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण आश्वासन दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार अपने वादे पर कायम है और आंदोलन में शामिल छात्रों के खिलाफ कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं होगी।
हालांकि सरकार ने यह भी साफ कर दिया कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या अन्य गंभीर अपराधों में शामिल लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस नहीं लिया जाएगा। तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान दर्ज की गई 2700 से अधिक एफआईआर गंभीर आरोपों से जुड़ी हैं और उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जाएगा।
यह मामला उस आंदोलन से जुड़ा है, जिसे नीट पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में चलाया गया था। इस आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया था। प्रदर्शनकारियों की तीन प्रमुख मांगें थीं, जिनमें परीक्षा में गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तथा आंदोलन में शामिल छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कदम न उठाने की मांग शामिल थी। सरकार ने इनमें से प्रमुख मांगों को स्वीकार करने का आश्वासन दिया था। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को उन याचिकाओं पर सुनवाई हुई, जिनमें 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं पर आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया। अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने सरकार से पूछा कि क्या आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस ली जाएंगी या उन्हें रद्द किया जाएगा। इसके जवाब में तुषार मेहता ने कहा कि सरकार अपने वचन का सम्मान करेगी और कानूनी रूप से जो भी उचित प्रक्रिया होगी, उसका पालन किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि किसी पुलिस अधिकारी ने आवश्यकता से अधिक बल का प्रयोग किया है, तो उसे केवल वर्दी के कारण संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि छात्र आंदोलन की आड़ में किसी ऐसे व्यक्ति को भी संरक्षण नहीं मिल सकता, जिसने वास्तव में कोई गंभीर अपराध किया हो। अदालत ने संकेत दिया कि मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है ताकि किसी निर्दोष के साथ अन्याय न हो और दोषी भी बच न सकें। नीट पेपर लीक विवाद ने इस वर्ष देशभर के लाखों छात्रों और अभिभावकों को प्रभावित किया। परीक्षा की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर उठे सवालों ने छात्रों में गहरा असंतोष पैदा किया। इसी पृष्ठभूमि में विभिन्न छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए, जो बाद में एक बड़े आंदोलन में बदल गए।
36 दिन चला आंदोलन, संसद मार्च के दौरान हुई थी झड़प
नीट पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर चला आंदोलन कुल 36 दिनों तक जारी रहा। आंदोलन के दौरान देश के कई हिस्सों में धरने, प्रदर्शन और रैलियां आयोजित की गईं। इसका सबसे बड़ा प्रदर्शन 20 जुलाई को दिल्ली में आयोजित संसद मार्च के रूप में सामने आया, जहां बड़ी संख्या में छात्र और समर्थक जुटे थे। प्रदर्शनकारियों का मुख्य आरोप था कि परीक्षा प्रक्रिया में गंभीर खामियां रही हैं और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। साथ ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी आंदोलन का प्रमुख हिस्सा बन गई थी।
संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच उस दिन तनाव की स्थिति पैदा हो गई। पुलिस का कहना था कि प्रदर्शनकारी निर्धारित क्षेत्र से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, जबकि आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि उन्हें अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया। स्थिति बिगड़ने पर सुरक्षाकर्मियों ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। इस दौरान कई प्रदर्शनकारी घायल हुए और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में भी लिया गया। इसी कार्रवाई को लेकर बाद में अदालत में याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें पुलिस की भूमिका की जांच की मांग की गई।
आंदोलन के दौरान लगातार सरकार पर दबाव बढ़ता गया। अंततः 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की गई।
इसके साथ ही आंदोलनकारियों की कुछ अन्य मांगों पर भी सरकार ने सकारात्मक रुख अपनाया। इनमें आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने और छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई न करने का आश्वासन शामिल था। अब इस पूरे मामले पर अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी। अदालत में यह देखा जाएगा कि सरकार ने अपने आश्वासनों को किस हद तक लागू किया है और प्रदर्शन के दौरान दर्ज मामलों तथा पुलिस कार्रवाई को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाने चाहिए। इस बीच केंद्र सरकार के ताजा रुख ने उन हजारों छात्रों को राहत दी है, जो आंदोलन में भाग लेने के कारण कानूनी कार्रवाई की आशंका से चिंतित थे।

