हिमाचल प्रदेश के सोलन, मंडी, धर्मशाला और पालमपुर नगर निगम चुनावों ने इस बार दिलचस्प मोड़ ले लिया है। जहां एक ओर कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने संगठन को मजबूत करने और जीत सुनिश्चित करने में जुटी हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर से उठी बगावत ने दोनों दलों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। टिकट वितरण के बाद असंतुष्ट नेताओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। अब चुनावी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा इन बागियों को मनाना बन गया है। बुधवार को नामांकन वापसी की अंतिम तारीख होने के कारण दोनों ही दलों के पास बेहद सीमित समय बचा है। दोपहर तीन बजे तक ही उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकते हैं, ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ नेता लगातार बागियों से संपर्क साध रहे हैं। फोन कॉल, व्यक्तिगत मुलाकातें और संगठनात्मक दबाव हर तरीका अपनाया जा रहा है ताकि किसी तरह असंतुष्ट नेताओं को मनाया जा सके। कई स्थानों पर पार्टी के भीतर गुटबाजी खुलकर सामने आई है।
टिकट न मिलने से नाराज नेताओं ने न सिर्फ निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया है, बल्कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत जनाधार भी रखते हैं। यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए ये बागी उम्मीदवार सिरदर्द बन गए हैं। यदि ये मैदान में बने रहते हैं, तो वोटों का बंटवारा तय है, जिससे सीधा फायदा विपक्षी दल को मिल सकता है। सोलन और मंडी में स्थिति खासतौर पर जटिल बनी हुई है। यहां कई वार्डों में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ ही उनके ही सहयोगी चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर संगठन को एकजुट रखना चुनौती बन गया है। धर्मशाला और पालमपुर में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर देखने को मिल रही है, जहां बागी उम्मीदवार अपने फैसले पर अड़े हुए हैं।
कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपने-अपने स्तर पर डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तेज कर दी हैं। वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है कि वे बागियों से बातचीत करें और उन्हें पार्टी हित में नाम वापस लेने के लिए राजी करें। कुछ मामलों में समझौते के संकेत भी मिल रहे हैं, जहां भविष्य में संगठनात्मक पद या अन्य जिम्मेदारियां देने का आश्वासन दिया जा रहा है। हालांकि, कई बागी नेता इस बार पीछे हटने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक पार्टी के लिए काम किया, लेकिन टिकट वितरण में उनकी अनदेखी की गई। ऐसे में वे अब जनता के बीच जाकर अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं। इससे साफ है कि अंतिम समय तक सस्पेंस बना रह सकता है कि कौन मैदान में बना रहेगा और कौन पीछे हटेगा। इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि नगर निगम चुनावों को दोनों प्रमुख दल कितनी गंभीरता से ले रहे हैं। ये चुनाव न सिर्फ स्थानीय सत्ता का सवाल हैं, बल्कि आगामी बड़े चुनावों के लिए माहौल तैयार करने का भी जरिया माने जा रहे हैं।
नामांकन वापसी आज, आखिरी पल तक जारी रहेगा सियासी ड्रामा
जैसे-जैसे नामांकन वापसी की समयसीमा नजदीक आ रही है, राजनीतिक गतिविधियां और तेज होती जा रही हैं। पार्टी कार्यालयों में बैठकों का दौर लगातार जारी है और नेताओं की आवाजाही बढ़ गई है। कई जगहों पर रातभर बैठकों का सिलसिला चला, जहां बागियों को मनाने के लिए रणनीति बनाई गई। यदि बागी उम्मीदवार चुनाव मैदान में डटे रहते हैं, तो मुकाबला बेहद कड़ा और अप्रत्याशित हो सकता है। खासकर उन वार्डों में जहां जीत-हार का अंतर कम होता है, वहां बागियों की मौजूदगी परिणाम को पूरी तरह बदल सकती है। यही वजह है कि दोनों ही दल किसी भी कीमत पर बागियों को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ स्थानों पर यह भी देखने को मिला है कि स्थानीय कार्यकर्ता बागियों के समर्थन में खुलकर सामने आ रहे हैं।
इससे पार्टी नेतृत्व की चिंता और बढ़ गई है, क्योंकि यह संगठन की एकजुटता पर सवाल खड़ा करता है। यदि समय रहते स्थिति को संभाला नहीं गया, तो इसका असर चुनावी नतीजों पर साफ दिखाई दे सकता है। वहीं, विपक्षी दल इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। वे इसे सत्तारूढ़ दलों की आंतरिक कमजोरी के रूप में पेश कर रहे हैं और मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी के भीतर ही असंतोष व्याप्त है। अब सबकी नजरें दोपहर तीन बजे पर टिकी हैं, जब यह साफ हो जाएगा कि कितने बागी मैदान में बने रहते हैं और कितने पार्टी के दबाव में आकर नाम वापस लेते हैं।
यह फैसला न सिर्फ इन नगर निगम चुनावों की दिशा तय करेगा, बल्कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति पर भी असर डालेगा। हिमाचल प्रदेश के इन चार नगर निगमों में चुनावी मुकाबला अब सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के बीच नहीं रह गया है, बल्कि बागियों की भूमिका ने इसे और भी दिलचस्प और जटिल बना दिया है। आने वाले कुछ घंटे यह तय करेंगे कि राजनीतिक समीकरण किस दिशा में जाते हैं और किसकी रणनीति भारी पड़ती है।

