भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के बाद अब इसका सीधा असर बैंक ग्राहकों की जेब पर दिखाई देने लगा है। केंद्रीय बैंक द्वारा रेपो रेट को बढ़ाकर 5.50 फीसदी किए जाने के बाद कई बैंकों ने अपने बाहरी बेंचमार्क और रेपो-लिंक्ड कर्ज की ब्याज दरों में 0.25 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी है। छह बैंकों ने अपनी संशोधित ब्याज दरें लागू कर दी हैं। इसका असर खास तौर पर उन ग्राहकों पर पड़ सकता है, जिनका कर्ज बाहरी बेंचमार्क से जुड़ा हुआ है। ऐसे ग्राहकों की ब्याज दर बढ़ने के साथ आने वाले समय में मासिक किस्त यानी ईएमआई पर भी असर पड़ सकता है। रेपो रेट वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्प अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। जब केंद्रीय बैंक इस दर में बदलाव करता है तो उसका असर बैंकिंग व्यवस्था की ब्याज दरों पर पड़ता है। रेपो से जुड़े कर्ज में ब्याज दरों का बदलाव अपेक्षाकृत तेजी से ग्राहकों तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि रिजर्व बैंक के फैसले के बाद बैंकों ने अपनी कर्ज दरों में बदलाव शुरू किया है।
इस बदलाव का असर नया कर्ज लेने वाले ग्राहकों के साथ-साथ मौजूदा फ्लोटिंग रेट वाले कर्जदारों पर भी पड़ सकता है। अगर किसी ग्राहक का होम लोन, वाहन ऋण, व्यक्तिगत ऋण या अन्य कर्ज बाहरी बेंचमार्क अथवा रेपो से जुड़ी ब्याज दर पर आधारित है और बैंक उस दर में बढ़ोतरी करता है, तो ग्राहक की उधारी की लागत बढ़ सकती है। कुछ मामलों में बैंक ईएमआई बढ़ा सकते हैं, जबकि कुछ स्थितियों में ईएमआई को समान रखते हुए कर्ज की अवधि बढ़ सकती है। आज, 8 अक्टूबर से लागू नई दरों में करूर वैश्य बैंक ने बाहरी बेंचमार्क से जुड़ी रेपो-लिंक्ड ब्याज दर को 8.55 फीसदी से बढ़ाकर 8.80 फीसदी कर दिया है। यानी इसमें 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इंडियन ओवरसीज बैंक और पंजाब नेशनल बैंक ने भी अपने बाहरी बेंचमार्क से जुड़े कर्ज की दरों में 0.25 फीसदी का इजाफा किया है। दोनों बैंकों की दर 8.10 फीसदी से बढ़कर 8.35 फीसदी हो गई है।
इंडियन बैंक ने अपनी रेपो-लिंक्ड बेंचमार्क लोन रेट को 7.95 फीसदी से बढ़ाकर 8.20 फीसदी कर दिया है। तमिलनाड मर्केंटाइल बैंक ने भी रेपो-लिंक्ड लोन रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी करते हुए इसे 8.25 फीसदी से बढ़ाकर 8.50 फीसदी कर दिया है। बैंक ऑफ बड़ौदा ने अपनी रेपो-लिंक्ड लोन रेट को 5.25 फीसदी से बढ़ाकर 5.50 फीसदी कर दिया है। इस तरह इन सभी छह बैंकों ने ब्याज दर में समान रूप से 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी की है। इन संशोधित दरों को 8 अक्टूबर से लागू किया गया है।
बैंकों की ओर से ब्याज दरों में यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है, जब रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति का रुख भी बदला गया है। रेपो रेट में बढ़ोतरी के साथ मौद्रिक नीति के रुख को ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ किए जाने से बाजार में यह संकेत गया है कि केंद्रीय बैंक महंगाई और वित्तीय परिस्थितियों को देखते हुए मौद्रिक नीति को सख्त बनाए रखने के लिए तैयार है।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सबसे सीधा असर नए कर्ज की लागत पर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर कोई ग्राहक अगर पहले की दर पर एक निश्चित राशि का होम लोन लेने की योजना बना रहा था तो नई ब्याज दर पर उसे कुल अवधि के दौरान अधिक ब्याज चुकाना पड़ सकता है। इसी तरह वाहन या व्यक्तिगत ऋण लेने वाले ग्राहकों की मासिक किस्त भी बढ़ सकती है। हालांकि ईएमआई पर वास्तविक असर सिर्फ ब्याज दर में बदलाव से तय नहीं होता। कर्ज की कुल राशि, बची हुई अवधि और बैंक की संशोधित दर के आधार पर ग्राहक पर पड़ने वाला प्रभाव अलग-अलग हो सकता है। बड़ी बकाया राशि और लंबी अवधि वाले कर्ज में ब्याज दर में मामूली बढ़ोतरी का असर भी लंबे समय में काफी अधिक हो सकता है।
नई ईएमआई का बोझ बढ़ सकता है, पुराने कर्जदार भी रहें सावधान
रेपो-लिंक्ड ब्याज दरों में बढ़ोतरी के बाद सबसे ज्यादा ध्यान मौजूदा फ्लोटिंग रेट वाले कर्जदारों को देना होगा। ऐसे ग्राहकों को अपनी ऋण शर्तों की समीक्षा करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि बैंक की संशोधित ब्याज दर उनके कर्ज पर कब से लागू होगी। ब्याज दर बढ़ने की स्थिति में ग्राहक के पास आमतौर पर दो तरह के प्रभाव देखने को मिल सकते हैं, या तो ईएमआई बढ़ेगी या फिर कर्ज चुकाने की अवधि लंबी हो सकती है। नया होम लोन लेने वालों के लिए भी अब कर्ज की पूरी लागत को ध्यान में रखना जरूरी होगा। केवल शुरुआती ईएमआई देखकर कर्ज का फैसला करना आगे चलकर महंगा पड़ सकता है। ब्याज दर में बदलाव की संभावना, कर्ज की अवधि और कुल ब्याज भुगतान को समझकर ही ऋण लेना बेहतर होगा।
अगर कोई ग्राहक अपनी ईएमआई को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना चाहता है तो ब्याज दर बढ़ने की स्थिति में कर्ज की अवधि बढ़ सकती है। इससे तत्काल मासिक बोझ तो सीमित रह सकता है, लेकिन लंबी अवधि में कुल ब्याज भुगतान बढ़ सकता है। दूसरी ओर, अगर ग्राहक बढ़ी हुई ईएमआई वहन कर सकता है तो वह कर्ज की अवधि को नियंत्रित रखते हुए अतिरिक्त ब्याज के बोझ को सीमित करने की कोशिश कर सकता है। बैंकों की ओर से रेपो-लिंक्ड दरों में यह बढ़ोतरी कर्ज लेने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। आने वाले समय में ब्याज दरों में होने वाले बदलाव पर ग्राहकों को नजर रखनी होगी। खासकर लंबी अवधि के होम लोन वाले ग्राहकों के लिए छोटी दर बढ़ोतरी भी कुल भुगतान पर बड़ा असर डाल सकती है।
ऐसे में नया कर्ज लेने से पहले अलग-अलग बैंकों की ब्याज दर, प्रसंस्करण शुल्क, कर्ज की अवधि और अन्य शर्तों की तुलना करना जरूरी होगा। मौजूदा कर्जदार भी बैंक से यह जानकारी ले सकते हैं कि नई दर उनके ऋण पर किस तारीख से लागू होगी और इससे उनकी ईएमआई या कर्ज की अवधि पर कितना असर पड़ेगा।कुल मिलाकर रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का असर अब बैंकिंग क्षेत्र में दिखाई देने लगा है। करूर वैश्य बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन बैंक, तमिलनाड मर्केंटाइल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा कर्ज दरों में बढ़ोतरी के बाद ग्राहकों के लिए उधारी की लागत बढ़ने की संभावना है। ऐसे माहौल में कर्ज लेने वालों के लिए ब्याज दर के साथ-साथ अपनी मासिक आय, मौजूदा देनदारियों और भविष्य की भुगतान क्षमता को ध्यान में रखकर फैसला करना पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

